Sunday, 13 November 2016

सूरत बदलनी चाहिए - भाग दो ( हालात-ए-वतन ) डॉ लोक सेतिया

          काला धन केवल साहूकारों नेताओं अफसरों और अपराधियों के पास ही नहीं है। अधिकतर तथाकथित धार्मिक संस्थाओं के पास जो पैसा जमा है वो भी ऐसे ही लोगों द्वारा दिया दान ही है। अभी किसी ने गंगा में नोट बहाये और उस पर बयान भी दिया गया मगर क्या आप मानते हैं ऐसा करने से किसी को पुण्य मिलेगा। जो ये सोचते हैं उनको शायद पावन शब्द का अर्थ समझना होगा , आप पाप की कमाई से गंगा को अपवित्र नहीं कर सकते। न कोई देवी देवता आपकी ऐसी कमाई से चढ़ाई राशि से आसीस ही देता है , लगता है लोग धर्म का कार्य नहीं दिखावे को आडंबर करते हैं। दाता को आपने भिखारी समझ रखा है , परमात्मा दाता है सब को देता है मांगता नहीं , जो आपको बताते हैं पैसे से देवी देवता या भगवान को खुश करने को उनका अपना स्वार्थ है। जिन भी आश्रमों में , मंदिरों में , या किसी भी धर्म स्थल में नोटों के अंबार जमा हैं उनको धर्म की किताब को ठीक से पढ़ना और समझना चाहिए। उनको सोने चांदी के मुकट या आसन बनवाने की जगह वही धन जनकल्याण के कामों पर खर्च करना चाहिए। धर्म और अधर्म का अंतर सब से पहले उन्हीं को समझना होगा। कोई नियम धर्मों पर भी लागू हो उनकी क्या सीमा होनी चाहिए धन संपति रखने की और जमा राशि जनता पर खर्च किया जाना अनिवार्य हो उसकी भी।
     जहां तक सरकार की बात है , देश भर में तमाम सरकारी भवन बने हुए हैं जिनकी शायद ही ज़रूरत हो , और बनाने की ज़रूरत ही नहीं , बल्कि उनको भी जनता की खातिर उपयोग किया जाना चाहिए। कुछ महीना पहले इक सभा हरियाणा मानव अधिकार आयोग ने आयोजित की थी , हैरानी हुई देख कर कि तमाम सरकारी भवन उपलब्ध होने के बावजूद सभा इक आलीशान बैंकट हाल में आयोजित की गई ताकि कुछ अतिविशिष्ट लोगों को ऐरकंडीशन हाल में आराम मिल सके। अब ऐसे आराम पसंद लोग गरीब जनता की तकलीफ क्या समझेंगे।  और ये बात तब और खुलकर सामने आई जब आयोग के उच्च अधिकारी भाषण में मानवाधिकार की हालत की नहीं , आयोग के पास अपना भवन होने और इक अतिरिक्त स्थान भी होने की बात गर्वपूर्वक बता रहे थे। सेवानिवृत अधिकारी को सरकारें उपकृत करती हैं ऐसे पदों पर बिठाकर जबकि उनका सरोकार समस्या से नहीं अपनी सुख सुविधा से होता है। जनता का धन इस तरह अपने चाटुकारों को किसी अकादमी का प्रमुख बनाकर खर्च करना भी अनुचित ही है।  मुझे ऐसे लोगों का जनता का धन अपनी सहूलियात पर खर्च करना उतना ही गलत लगता है जितना रिश्वत लेने वालों का जनता से घूस लेना।  कई देशों में ऐसा नियम है कि जब शाम को सरकारी दफ्तर बंद हो जाते हैं , उसके बाद उसी जगह को उनको आश्रय देने को उपयोग किया जाता है जो बेघर हैं और वो रात वहां सो सकते हैं व सुबह चले जाते हैं।  अपने देश में प्रशासन जनता से ऐसा सहयोग करने की सोचता तक नहीं है। जनता की परेशानी से उनको मतलब ही नहीं होता है।
        इक अन्य बुराई की शुरुआत ही बहुत पहले हो गई थी आज़ादी के बाद ही। किसी भी नेता की मौत के बाद उसकी समाधि बनाना वह भी कई कई एकड़ ज़मीन पर , इस देश की गरीब जनता के साथ क्रूर मज़ाक है। उस के बाद कितने लोगों की याद में कितनी भूमि कितना धन ऐसे कार्यों पर खर्च किया जाता रहा जो वास्तव में उन्हीं महान नेताओं के आदर्शों के ही विरुद्ध है। ऐसी बहुत सी बातें हैं जिन पर फिर से विचार किया जाना ज़रूरी है। देश में दो वर्ग नहीं हो सकते इक आम दूजा ख़ास। वी आई पी शब्द ही अलोकतांत्रिक है। क्या हम सच्चे लोकतंत्र हैं , अगर हैं तो लोक अर्थात जनता कहां है। अभी सिर्फ तंत्र ही तंत्र दिखाई देता है।

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