Wednesday, 16 November 2016

जुर्म है आम जनता होना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       सत्ता का आदेश था , जनता को मानना लाज़मी था। कोई चारा नहीं होता आम आदमी के पास , विकल्प क्या है सर झुकाने के सिवा। लोग कतार में खड़े रहे आखिरी सांस तक तो विशेष क्या बात है। आप उनकी सुनो जो बतला रहे हैं अपने त्याग की बात। याद आया कुछ साल पहले भी विदेशी मूल की है का सवाल उठा तो किसी ने अपनी जगह इक ऐसे ईमानदार और काबिल व्यक्ति को प्रधानमंत्री बना दिया जिसने आगे चल कर नया इतिहास रचा। ऐसी कठपुतली कभी पहले देखी न सुनी जिस ने अपने शासन में घोटालों का पंचम इतना ऊंचा फहराया हो। आज तक उनको किसी ने अपराधी समझा , दी कोई सज़ा , कदापि नहीं। इनका भी त्याग महान है। काश सभी को घर बार छोड़ प्रधानमंत्री पद मिल सकता तो सभी इक बार क्या सौ बार छोड़ देते। मगर जो दुनिया ही छोड़ गये चंद रुपये अपने ही खाते से निकलवाते हुए , उनकी मौत पर आंसू भी कोई नहीं बहाता। दिन भर चिंता रही इक नेता की बीमारी की जिनको देश के सब से अच्छे एम्सस अस्पताल में सब से बेहतरीन स्वास्थ्य सेवा मिल रही है। कोई आम नागरिक नहीं होते नेता जो नोट नहीं बदलने पर बिना उपचार मर जाते हैं। कोई नहीं कहता आप कुछ सुधार नहीं करो , सब इतना ही चाहते हैं जैसे आप बड़े लोगों की खातिर हर प्रबंध हर हालत में हो जाता है उसी तरह मरते हुए ही सही आम और खास दोनों बराबर हो जायें। ज़िंदगी नहीं दे सकते आप जनता को सुकून की तो कम से कम मौत ही सुकून की दे दो। जनता होना क्या बेमौत मरना है , क्या इसी को लोकतंत्र कहते हैं।
                             पहली बार हैरानी हुई ऐसी मौत पर कोई मुआवज़ा भी सरकार ने घोषित नहीं किया , वरना शायद व्हाट्सऐप वालों को इक और चुटकुला मिल जाता मनोरंजन को। चार हज़ार लेने वाले को चार लाख मिले मर जाने पर। मगर नेता लोग सोचते हैं इन गरीबों का जीना क्या और मरना क्या , इक मोहरा ही तो हैं राजनीति की शतरंज की चाल का। चलो मर कर ही सही इस आज़ाद  देश में नर्क सा जीवन जीने से तो मुक्ति मिली , उनको न सही उनकी आत्मा को आभारी होना चाहिये सरकार और प्रधानमंत्री जी का। इनके पास आपकी हर बात का जवाब है , आपकी किसी भी समस्या का समाधान नहीं। सुनी उनकी बातें , अपना अपराध नहीं मानते औरों का याद दिलाते हैं , उन्होंने 1 9 महीने देश को जेल में बंद किया था , ... खाली स्थान भर लेना आप खुद आगे क्या कहना चाहते हैं। आपका इरादा क्या है बता देते आप भी। याद आया किसी वकील ने किसी नेता को पत्र लिखा था ये शब्द उपयोग करते हुए , " ये कहना बेकार है कि आपको शर्म आनी चाहिये "। किसी भी नेता की मौत कितनी बड़ी आयु में हो बयान वही रहता है देश को अपूरणीय क्षति का। इन कतार में मरने वालों से देश का कोई नुकसान नहीं हुआ , जो भी क्षति हुई बस किसी परिवार वालों को हुई। कहीं आग लगी तो मरने वालों को सरकार बताती है दोषी वो सिनेमा हाल का मालिक है , ऐसे मरने वालों की मौत का दोषी कोई भी नहीं। किसी को अफसोस नहीं , खेद नहीं , दुःख नहीं तो अपराधबोध का प्रश्न ही नहीं। आपको ऐसे ही मरना है क्योंकि आपका अपराध है आम जनता होना। भारतवर्ष में यही सब से बड़ा अपराध है।

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