Sunday, 13 November 2016

आस्तिकता और नास्तिकता के भंवर में ( कविता ) 124 भाग दो - डॉ लोक सेतिया

ये मेरी कैसी दुविधा है ,
बचपन से आज तक
मानता रहा हूं कि वो है  ,
हर दुख में हर परेशानी में
उदासी के हर इक पल में ,
जब नहीं होता था कोई साथ
तब यकीन करता रहा हूं
कोई हो न हो वो तो है ना ,
जो जनता है मेरी हर इक बात
समझता है मेरे हालात मेरी विवशता  ,
और मैं मन ही मन करता रहा विनती
उसी से निराशाओं की हर घड़ी में  ,
और तमाम उम्र बिता दी
इक ऐसी झूठी उम्मीद के सहारे  ,
जो कभी हो नहीं पाई पूरी जीवन भर।
जब लगने लगा टूट चुकी है आस्था
और सोच लिया बस अब नहीं रहना ,
तकदीर बदलने की झूठी आशा में
जो पूरी नहीं हो पाई कभी भी अब तक ,
आशा और अंधविश्वास को लेकर  ,
तब भी पल पल रहती है वही बात
मेरे दिल और दिमाग में इक डर बनकर ,
कहीं उसको नहीं मानना उसको और भी
नाराज़ तो नहीं करता होगा जिसको मैं ,
कभी खुश नहीं कर पाया अपनी आस्था से।
मालूम नहीं इसको क्या कहते हैं
मैं आस्तिक हूं या नास्तिक रहा हूं ,
ढूंढता रहा उसको निराशा में मतलब को
पूजता रहा अपनी ज़रूरत की खातिर ,
अधूरा रहा मेरा विश्वास मेरी आस्था
इक शक रहा है विश्वास अविश्वास के बीच  ,
आज भी खत्म नहीं हुई मेरे मन की दुविधा
उसको चाहता हूं मैं या केवल डरता हूं मैं।

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