Sunday, 9 October 2016

श्री महेन्दर जैन जी ( मित्र लेखक ) की रचनाएं और परिचय

    साहित्य सृजन करना और बात है और समाज में साहित्य को बढ़ावा देना और बात। ये अदभुत गुण मैंने कवियत्री चन्दन बाला जैन जी में जितना देखा शायद पहले कहीं नहीं देखा था। हिसार के स्थानीय डिश टीवी पर अपने शहर से भी और आस पास दूसरे शहरों से भी शायर कवि आमंत्रित कर नियमित कार्यक्रम संचालित करना जैसे उनकी साहित्य की अर्चना थी। ममता और वात्सल्य की मूरत लगी थी मुझे वो। मेरी महेन्द्र जैन जी से पहचान उन्हीं से जुड़ी हुई है। वो उनकी बहिन थी और प्रेरणा भी साहित्य की सेवा को प्रेरित करने में , आज उनके स्वर्गवास होने के बाद भी " चन्दनबाला  जैन साहित्य मंच " संस्था उन्हीं के काम को जारी रखे है। महेन्दर जैन ग़ज़ल बाल साहित्य और दोहे जैसी विधाओं के रचनाकार ही नहीं हैं , उनका साहित्य और साहित्यकारों को बढ़ावा देने का काम उनको और भी अलग जगह प्रदान करता है। बेशक उनको ये गुण विरासत में मिला है उनका ये कहना है , मगर कितने लोग होते हैं जो अपने अग्रजों की अच्छी बातों को जीवन में लागू करते हैं। यकीनन खुद में वो भावना होना पहली शर्त है। आज उनकी रचनाओं को लिखने से पहले मुझे ज़रूरी लगा चन्दनबाला जी की इक लोकप्रिय ग़ज़ल को यहां लिखना। प्रस्तुत है ::::
                         चन्दनबाला जैन जी की ग़ज़ल ( दर्द की परछाइयां - पुस्तक से )
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              दर्द सबको ही सुनाएं , ये ज़रूरी तो नहीं
              हर जगह हम मुस्कराएं , ये ज़रूरी तो नहीं।
              कारवां लेकर चले थे , हम सफर पर दोस्तो
              साथ आखिर तक निभाएं , ये ज़रूरी तो नहीं।
              बेवजह कोई रूठ कर जाता है जाने दीजिए
              हम उसे जाकर मनाएं , ये ज़रूरी तो नहीं।
              यूं तो शायर ने लिखी होंगी हज़ारों पंक्तियां
              शेर सारे दाद पाएं , ये ज़रूरी तो नहीं।
              कर लिया सामान यूं सौ साल जीने के लिए
             सबको खुशियां रास आएं , ये ज़रूरी तो नहीं।
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           अब कुछ ग़ज़लें महेन्द्र जैन जी की पेश हैं ::::::::
1                   ग़ज़ल
मैंने अक्सर यार हादसा ऐसा होते देखा है
परियों की गाथा सुन बच्चा भूखा सोते देखा है।
जिन लोगों के अपने चेहरे पर है कालिख पुती हुई
ऐसे लोगों को मैंने दर्पण को धोते देखा है।
बेदर्दी पत्थरदिल होकर रहते हैं जो इस जग में
अपने दुख में चीख चीख कर उनको रोते देखा है।
मेहनत करके भी पल दो पल सुख जिनको नहीं मिलता
अपनी खुशियों को सपनों में उनको संजोते देखा है।
नींद नहीं आती मालिक को नर्म मखमली बिस्तर पर
मज़दूरों को पत्थर पर आराम से सोते देखा है।
भूल न जाना कभी महेन्द्र तू ये बात बुज़ुर्गों की
उसने फ़स्ल वही काटी है जैसी बोते देखा है।
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2              ग़ज़ल
अंगारों पर चलना सीख
जीना है तो मरना सीख।
मोती ही शायद बन जाए
बनकर बूंद टपकना सीख।
तू शिव शंकर बन जाए
विष के घूंट निगलना सीख।
घाटी तक जाना है तुझे
पहले पर्वत चढ़ना सीख।
आएगा मधुमास ज़रूर
पतझड़ में भी रहना सीख।
दूर नहीं है साहिल अब
मंझधारों से लड़ना सीख।
सुख पाना है गर जग में
हर सांचे में ढलना सीख।
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3                ग़ज़ल
कैसे हैं हालात न पूछ
मुझसे तू हर बात न पूछ।
मिली तरक्की उनको पहले
क्या दी थी सौगात न पूछ।
आज न उसको घूस मिली तो
कैसे गुज़री रात न पूछ।
दुल्हन लिये बिना कैसे
लौट गई बारात न पूछ।
कैसे ले ली महंगी गाड़ी
बाबू की औकात न पूछ।
उसे सिनेमा घर में देखा
कौन था लेकिन साथ न पूछ।
थाने में जो कत्ल हुआ
किसका उसमें हाथ न पूछ।
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4            ग़ज़ल
झूठा सब व्यवहार हो गया
सच कितना लाचार हो गया।
रूप कहां चेहरे पर असली
नकली सब श्रृंगार हो गया।
झौपड़ियों की लाशों पर अब
महलों का विस्तार हो गया।
जिसने फ़स्ल उगाई थी वो
खुद भूखा लाचार हो गया।
मन्दिर मस्जिद टूट रहे हैं
बेघर अब करतार हो गया।
किसपर अब विश्वास करें हम
दोस्त ही जब गद्दार हो गया।
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5       ग़ज़ल
फिर-से शुरू कहानी कर
मत कोई नादानी कर।
व्यसनों के तू चक्कर में
मत बेकार जवानी कर।
कट जाएगा शीघ्र सफर
बातें नई पुरानी कर।
नाम कमाना यदि चाहे
तो कोई कुर्बानी कर।
करना है यदि काम बड़ा
बात कोई मर्दानी कर।
कब का बचपन बीत चुका
अब तो बात सयानी कर।
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6            ग़ज़ल
लगता जीवन सुन्दर है
दुख का मगर समुन्दर है।
पहले था लंका में ही
अब तो रावण घर-घर है।
पंछी उड़ न सकेगा अब
काट दिया इसका पर है।
हाल न पूछो संसद का
मछलीघर से बदतर है।
महल बना औरों के वो
खुद रह जाता बेघर है।
कातिल बदला है लेकिन
बदला कब ये ख़ंजर है।
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7         गीत

फूलों को बाहों में भरकर कांटों से भी प्यार किया है
जीवन की दुर्गम राहों को हंसते हंसते पार किया है।
जब भी पास निराशा आई आशावादी गीत लिखा है
जिसने भी ठुकराया मुझको उसको अपना मीत लिखा है
मंज़िल को पाकर भी मैंने राहों से अभिसार किया है।
फूलों को -------------------------------------
जगमग जग की चकाचौंध ने मेरे दिल को था ललचाया
भौतिक सुख के फूलों ने भी अपनी खुशबू से भरमाया
लेकिन जग की पीड़ाओं को भी मैंने स्वीकार किया है।
फूलों को ----------------------------------------

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