Saturday, 15 October 2016

सुश्री कमल कपूर ( मित्र लेखिका ) जी की रचनाएं अवं परिचय

            प्रस्तुत हैं कमल कपूर जी की रचनाएं  :::::::::
1               असली चेहरा ( लघुकथा )
      शुभ्रा देवी खादी की रेशम सी चमकीली साड़ी पहन कर नगर के होली उत्सव में जाने को घर से निकली , सज धज कर नई नवेली दुल्हन सी , दरवाज़े से बाहर कार की तरफ जा रहीं थीं कि घर के माली की बिटिया केसर कंवर। राम राम सा , बधाई हो मालकिन आपको होली मुबारक हो , कहते झुक कर आदर से गुलाब की पंखुड़ियां और गुलाल उनके पैरों पर धर दिया ख़ुशी से मुस्कुराते हुए। गुलाल के कुछ कतरे उनकी साड़ी पे लगे उड़ कर और कुछ उनकी कार पर। ऐसा कोई और करता जिसको शुभ्रा देवी अपने बराबर मानती तो यकीनन वो इक शुभ शगुन लगता उनको , मगर नौकर की बेटी की शुभकामना उनको पसंद नहीं आई। डांट दिया बेचारी को , मूर्ख लड़की ये क्या किया देख नहीं सकती बाहर जा रही हूं , मेरी साड़ी खराब कर दी। केसर कंवर को समझ नहीं आया क्या भूल हुई उस से , बोली मैडम जी आज होली है। शुभ्रा देवी कहने लगी तो क्या तुम हमसे खेलोगी होली , समझती नहीं होली अपनी बराबरी वालों से खेली जाती है।
          रामू काका ड्राइवर देख रहे थे , प्यार से बुलाया केसर को और बोले बिटिया रानी मुझे लगाओ गुलाल और रंग लगवा उसको दस रूपये दिये मिठाई खाने को। सोचने लगे रामू काका अभी जब होली उत्सव में होंगी मैडम जी तब कोई गरीब लड़की भले वो अनजान भी हो यही कर दे तो शुभ्रा जी मुस्कुरा कर उसको गले लगाकर फोटो करवाती अख़बार वालों को देने को। महिला समाज सेविका का असली चेहरा अभी जो यहां दिखाई दिया कोई नहीं देख पाता।
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2                       पर्याय ( लघुकथा )
      इकलौता बेटा चार साल बाद चार दिन को विदेश से अपने देश आया तो मां की ख़ुशी की सीमा नहीं थी। जाने क्या सोच मां ने अपने दिल की बात कह ही दी , आखिर कब तक इंतज़ार करती कि खुद बेटा कहता मां पिता जी नहीं रहे तुम यहां अकेली कैसी जीती होगी। आपको साथ ले चलता हूं , बहु पोतों पोतियों के साथ रहना ख़ुशी से। आना तो मैं खुद ही अपने देश में वापस हूं पर क्या बताऊं मज़बूरी है नहीं संभव अब आना। मगर समझ चुकी थी नहीं कहेगा सुपुत्र ये बात। जी भर उसकी पसंद की हर चीज़ बनाकर खिलाने के बाद पास बैठ हाल चाल पूछते बताते कह दिया अब मुझ से अकेले नहीं रहा जाता। बेटा कहने लगा मां तुम नहीं रह सकोगी उस देश में विदेशी बहु भी नहीं चाहती साथ रहना। यहीं खुश रहो आप , देखो मैं आपके लिये क्या क्या लाया हूं। लैपटॉप स्मार्ट फोन और भी आधुनिक सामान , देख ही नहीं सकीं मां की भीगी हुई पलकें। बस यही सोच रही थी उसको किसकी ज़रूरत है इकलौती संतान की अथवा इस सामान की। क्या ये सब पर्याय बन सकती हैं बेटे का कभी। फिर भी मां थी आंसू छुपा कर मुस्कुराई थी बच्चे को उदास तो नहीं देख सकती थी।
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3                         तो कोई बात बने (  गीत )
       दर्द मिटता नहीं है रोने से ,
      जो दवा उस को बनाओ तो कोई बात बने ,
      अश्क पलकों पे सजा कर रख लो ,
      प्यार की धुन में गीत गाओ तो कोई बात बने।
     ये जो कांटें भरे हैं दामन में किसी ने ,
     हंस के उन से भी निभाओ तो कोई बात बने ,
     बाग़ में फूल खिलाना सभी को आता है ,
     कभी सेहरा में फूल उगाओ तो कोई बात बने।
     शायरी है डूबना गरहाई में जाकर ,
     मोती कुछ ढूंढ कर लाओ तो कोई बात बने ,
     लोग अंधरों को बढ़ाने के हैं हक़ में चाहे ,
     शमां उम्मीदों की जलाओ तो कोई बात बने।
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4           मेरे मन में तू  ( गीत )
     मेरे मन में तू , पा लिये सब अर्थ ,
    बस इक तेरे ही नाम में मैंने ,
    रहता है शामिल ,
    मेरी हर धड़कन में तू।
   राहें जुदा जुदा हैं तो क्या ,
   दूर हैं नहीं हैं पास तो क्या ,
  चाहत दोनों की कभी कम न होगी ,
  दिल में भी तू है जिगर में तू।
  गिला कैसा मिली रुसवाई से ,
  इश्क़ बढ़ता जा रहा तन्हाई में ,
 मिलेंगे किसी मुहब्बत के जहां में ,
 तुझ में हूंगी मैं तब मुझ में तू।      

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