Monday, 3 October 2016

उनका साहित्य , मेरी बातें ( सवाल कठिन है ) डॉ लोक सेतिया

       कोई ऐसी बात तो नहीं की जो अनुचित कही जा सके , फिर भी मुझे अच्छी नहीं लगी उनकी बात , शायद मुझे उनसे आपेक्षा नहीं थी कि वो भी उसी तरह की ही बात करेंगे जैसी सभी दुनिया वाले करते हैं। बहुत नाम सुनता रहा हूं उनका , बहुत बड़े साहित्यकार हैं। मैंने उनसे साहित्य पर ही बात करने को संपर्क किया था , ये उनको भी मालूम भी था , फिर भी किसलिये वो साहित्य की बातों से इत्तर और ही बातें करना चाहते थे। मैं कहता रहा उनकी रचनाओं की बात और वो अनसुना करते रहे मेरे हर सवाल को , और मुझे से पूछते रहे मेरी ज़मीन जायदाद और आमदनी की बात। मेरे लिये जिन बातों का कोई महत्व नहीं था , उनको वही ज़रूरी लगती थीं। सच मैं नहीं समझ पाया उनकी बातों का मतलब। उम्र भर मिलता रहा हूं ऐसे लोगों से जो मुझे छोटा साबित करने को बिना पूछे मुझे बताया करते थे कि उनकी आमदनी कितनी अधिक है , क्या क्या बना लिया उन्होंने पैसा कमा कमा कर। फिर कहते आप खूब हैं जो कितनी कम आय में गुज़र बसर कर के भी खुश रहते हैं। उनको मेरी थोड़ी आमदनी से मतलब नहीं था , उस के बावजूद खुश रहने से परेशानी थी। मुझे पता है अधिकतर लोग एक ख़ुशी हासिल करते हैं ऐसी बातें कर के। शायद कहीं न कहीं वो हीन भावना के शिकार होते हैं और जिनको समझते हैं हमसे छोटे हैं उनसे ये बातें करते हैं अपनी हीन भावना को दूर करने को। लेकिन आज तक न वो अपनी हीन भावना मिटा पाये न ही मुझे हीन भावना का शिकार ही कर पाये हैं। उल्टा मुझे यही लगता है कि ये सब धन दौलत पाकर भी उनको वो ख़ुशी नहीं मिली है जो मेरे पास है बिना धन दौलत के। तभी मैं कभी दुनिया वालों से कोई मुकाबला करना चाहता ही नहीं। मुझे उनके मापदंड समझ ही नहीं आये  , खुद अपने बनाये मापदंडों से अपने को बड़ा साबित करने की कोशिश ही करते रहते हैं। मैं जो हूं जैसा हूं उसी को स्वीकार कर चैन से रहता हूं , आदमी को कितनी ज़मीन चाहिये , दो गज़ , उस कहानी को कभी भूला नहीं। कोई कह सकता है मैं तरक्की करना ही नहीं चाहता , मुझे परवाह नहीं उनकी बातों की , किसी की बातों से मैं जो नहीं करना है वो नहीं कर सकता दुनिया की दौड़ में तरक्की हासिल करने को।
                 आज मुझे इक लेखक एक साहित्यकार से वही बातें सुन समझ नहीं आया क्या चाहते हैं वो। क्या उनको मुझ से साहित्य की बात करना इसलिये पसंद नहीं था क्योंकि मुझे वो छोटा समझते हैं लेखन में। बेशक मैंने आज तक इक पुस्तक भी नहीं छपवाई है तो क्या इसी से मेरा आंकलन करते हैं। मुझे न लेखक कहलाना है न साहित्यकार कहलाने को लिखता हूं , मगर फिर भी नियमित लिखता रहता हूं अपने देश समाज की वास्तविकता को। क्या ये महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। अब केवल उनकी और मेरी बात को छोड़ सभी की बात करते हैं। लेखक हैं लिखते हैं , कविता कहानी , लगता है सभी के दुःख-दर्द को महसूस करते हैं , सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है। मगर जब अपने आस पास लोगों को परेशान देखते हैं तब हमारे अंदर का दर्द कहां छुप जाता है , तब औरों की परेशानी या दुःख क्यों हमें परेशान नहीं करती और हम संवेदना रहित और पाषाण हृदय बन जाते हैं। ये देख कर मैं सोचता हूं जो कविता जो कहानी हमने लिखी , अगर वो खुद हम में संवेदना मानवीय दुःख दर्द के प्रति नहीं जागृत कर पाई तो क्या उसको सफल मान सकते हैं। सैकड़ों किताबें लिख कर भी क्या होगा , कोई क्या सोचता है कभी। साहित्य का ध्येय क्या है।

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