Wednesday, 26 October 2016

भगवान भी बदल गये हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

दादा जी कहते थे ढूंढने से भगवान भी मिल सकते हैं। तुम तलाश करते रहना सच्चे मन से। मां सुबह शाम इक भजन गुनगुनाती रहती थी " भगवन बनकर तू अभिमान न कर , तेरा नाम बढ़ाया हम भक्तों ने "। मैंने उनको छोड़ और किसी को भगवान को ऐसे चेतावनी देते नहीं सुना , कि भले तुम विधाता हो फिर भी कोई अकड़ मत रखना , क्योंकि अगर हम तेरे उपासक ही तुझे नहीं मानेंगे तो तुम काहे के भगवान रहोगे , बस नाम मात्र के ही। मुझे इस से बढ़कर श्रद्धा किसी साधु संत सन्यासी या गुरु में नहीं नज़र आई। तभी मैंने किसी को गुरु नहीं बनाया आज तक। मिलता रहा भगवा सफेद पीला काला हरा नीला परिधान पहने महान समझे जाते लोगों से , तथाकथित धर्म को स्थापित करने में लगे प्रवचन करने वालों से। उनसे भी जो गीता ज्ञान या रामायण अथवा गुरु ग्रन्थ साहिब का या फिर कुरान बाईबल का अर्थ समझाते हैं। और बार बार इक शायर का शेर याद आता रहा। " तो इस तलाश का मतलब भी वही निकला , मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला "।
                           लेकिन कहते हैं ना लगे रहो तो सफलता इक दिन मिल ही जाती है। कल रात मुझे भगवान मिल ही गये साक्षात रूप में। नहीं किसी धर्म स्थल पर नहीं यूं ही इक उजड़े हुए वीरान घर में वह भी अकेले उदास और बेहाल। मैं दुनिया के लोगों से घबरा कर यूं ही चला गया था उधर जिधर कोई जाता ही नहीं। शहर की भीड़ से दूर गंदी बस्ती से भी और आगे जाकर। अंदर गया था उस खंडर नुमा इमारत में छुप कर अकेले में आंसू बहाने देश समाज की बदहाली को देख कर। मेरा दर्द किसी को समझ आता ही नहीं है , सभी कहते हैं मैं पागल हूं जो व्यर्थ चिंता करता रहता हूं। मुझे चुपचाप रोते रोते आभास हुआ कोई और भी है यहां पर , अंधेरा था तब भी मुझे दिखाई दिया वो चमकती लौ की तरह दिया बनकर या शमां की तरह। मन ही मन सोचा इस वीरान घर में कौन है जो रौशनी करता है , नज़र क्यों नहीं आता सामने , छिपकर रहता है , कोई चोर है या अपराधी। बस इतना सोचते ही वो मेरे सामने खड़ा थे , मुझे प्यार से गले लगा लिया और कहने लगे , तुम तो मुझे चोर या अपराधी मत समझो। मैं तो कब से तुम्हारी और तुम जैसे और उन लोगों की राह देखता रहा हूं
जो मुझे ढूंढते रहते हैं। आज मिला हूं तो मुझे पहचाना भी नहीं , भूल गये अपने दादा जी की बात , तुम्हारी माता जी जो गुनगुनाती थी उस भजन को भी भूल गये। याद करो और आज पहचान लो मुझे। और मुझे यकीन करना पड़ा था क्योंकि उन्होंने मुझे सब कुछ साफ साफ़ दिखला भी दिया था और समझा भी। भगवान की लीला थी कि मैं सुबह जागा तो अपने घर में बिस्तर पर। मगर वो कोई सपना नहीं था , मैं वास्तव में रात भाग कर गया था इस दुनिया से।  वापस कौन कब कैसे मुझे पहुंचा गया , मुझे नहीं मालूम। मुझे याद है भगवान ने मुझे जो भी बताया था , आपको सुनाता हूं , चाहे आप विश्वास करना या नहीं।
                       भगवान ने बताया था , तुमने पढ़ा होगा , सुना होगा , देव और दानव , पुण्य और पाप , सत्य और झूठ , अच्छाई और बुराई , धर्म और अधर्म के बारे में। पढ़ना इक बात है समझना दूसरी और तीसरी बात होती है विचार करना। दुनिया बनाते समय सभी को सोचने समझने को बुद्धि दी और कर्म करने को हाथ पैर , देखने को आंखें और अन्य कामों को सभी अंग भी। भगवान कौन है क्या है कहां है सोचा समझा विचार किया कभी। जाने किस किस को भगवान बना लिया आपने अपनी सुविधा से या स्वार्थ की खातिर। जैसे तुम इंसानों में अच्छाई और बुराई दोनों रहती हैं , विवेक से तुम अच्छा बनते हो बुराई लुभाती हो  तब भी बचते हो , उसी तरह मुझ में भी राम-रावण , कृष्ण-कंस , दोनों बसते हैं। और ईश्वरीय सत्ता उसी के पास रहती है जिसको सभी भगवान मानते हैं। आज मेरा जो रूप बुराई का है वही पूजा जाता है इसलिये जिस भगवान को तुम ढूंढते रहे वो तुम्हें किसी मंदिर मस्जिद गिरिजाघर या गुरूद्वारे में मिला ही नहीं। मुझे , मेरे उस स्वरूप को निकाल दिया गया उन सभी जगहों से , आज जो विशाल भवन मेरे नाम पर दिखाई देते हैं , उन में मैं नहीं रहता। कभी जाता ही नहीं उस ओर मैं भूल कर भी , करोड़ों की आमदनी संपति , चढ़ावा। मुझे क्या समझ लिया लोभी लालची रिश्वतखोर जो खुश होकर आपकी हर मनोकामना पूरी करता है। ठीक से पढ़ना फिर से सभी धर्म ग्रन्थ , उनमें समझाया गया है देवता वही होते जो देते हैं , दानव होते जो औरों का छीनते हैं। आज कलयुगी भक्त अपने जैसे बुरे की उपासना करते हैं , सही करते या गलत बिना सोचे। यूं समझ लो अधर्म का नाम बदलकर उसको धर्म नाम दे दिया है। पहचान करना भगवान जो थे वो अब नहीं हैं , बदल गये हैं। भगवान पापियों की सुनते हैं उनकी कामनाओं की पूर्ति करते हैं , बुराई तभी बढ़ रही है। खेद है मेरे लिये लोकतंत्र जैसा चुनाव भी नहीं होता , जो मैं आपको समझाता , बुरे को नहीं अच्छे को भगवान बनाना इस बार। देखता हूं भारत में सत्ता बदलते ही भला लगने वाला भी बुरे से बद्दतर आचरण करने लगता है। मैं भी क्या करुं आप बताओ मुझे। वो भगवान खुद को बताने वाले चले गये मगर इक किरण रौशनी की मुझे दिखला गये हैं।

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