Sunday, 16 October 2016

ग़ज़ल 111 ( दर्द अपने हमें क्यों बताए नहीं ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

दर्द अपने हमें क्यों बताए नहीं
दर्द दे दो हमें हम पराए नहीं।

आप महफ़िल में अपनी बुलाते कभी
आ तो जाते मगर बिन बुलाए नहीं।

चारागर ने हमें आज ये कह दिया
किसलिए वक़्त पर आप आए नहीं।

लौटकर आज हम फिर वहीं आ गए
रास्ते भूलकर भी भुलाए नहीं।

खूबसूरत शहर आपका है मगर
शहर वालों के अंदाज़ भाए नहीं।

हमने देखे यहां शजर ऐसे कई
नज़र आते कहीं जिनके साए नहीं।

साथ "तनहा " के रहना है अब तो हमें
उन से जाकर कहो दूर जाए नहीं।

1 comment:

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

आप महफ़िल में अपनी बुलाते कभी ,आ तो जाते मगर बिन बुलाए नहीं। वाह , बहुत खूब !