Monday, 26 September 2016

श्री जवाहर ठक्कर ज़मीर ( मित्र शायर ) की ग़ज़ल और उनका परिचय

         अभी पार्क गया सैर पर जब मैं तो हमेशा की तरह उस बैंच को देखते ही इक कमी सी लगी , सुबह पार्क में प्रवेश करते ही मुझे वहीं बैठा मिलता था मेरा दोस्त। आजकल कुछ अस्वस्थ चल रहा है और इस शहर से दूर चंडीगढ़ जा बसा है , फिर भी लगता है यहीं कहीं पास ही है। ठक्कर साहब का फतेहाबाद से नाता ही कुछ ऐसा है। मुझे दोस्त कम ही मिले हैं और जो मिले उनसे भी बहुत लंबे समय तक मेल जोल बेहद कम ही रहा  है। फिर भी जितने पल हमने साथ साथ बिताये हैं वो मेरे जीवन के बेहद खूबसूरत पलों में शामिल रहे हैं। वो अक्सर शाम को मेरे पास चले आना और घंटों ऐसे गुज़र जाना जैसे अभी अभी आये हो , कुछ था जो औरों से अलग था। शायरी की बातें कुछ अपने जीवन की बातें करते रहे हम इस तरह जैसे कोई किताब सामने हो खुली पढ़ने को। जब से हमारा परिचय हुआ तभी से अपनी हर ग़ज़ल सब से पहले आप ही को सुनाई है और तभी समझ आता रहा है कि कैसी है। आदत ही नहीं थी आपकी कमी बताने की फिर भी आपकी आवाज़ और ढंग मुझे बता देता था कि नहीं अभी ठक्कर साहब को ग़ज़ल वास्तव में पसंद आई नहीं है। मुझे बिना कुछ कहे ऐसे आपसे और अच्छा लिखने का मार्गदर्शन मिलता रहा है। कभी कभी लगता है जैसे कुछ शायर अपनी प्रेमिका की खातिर लिखते हैं मैं अपने दोस्त की खातिर लिखता रहा हूं ये सोच कर कि आज जब वो आयेगा तो ये सुनानी है। रविवार को अक्सर मुझे ज़रूरत रहती है बस किसी एक दोस्त के साथ की , जैसे मैं जब चाहता आपके घर चला जाता था और फिर हारमोनियम  पर आपकी धुन और मेरी और हम दोनों की मिली जुली आवाज़ में हम पुराने फ़िल्मी गीत और अपनी ग़ज़लें गाते रहते देर शाम तक। जब भाभी जी होती घर पर तब चाय के साथ पकोड़े या ब्रेड रोल खाने का मज़ा भला कभी भूल सकता है। बहुत कम लोग मिलते हैं जिनसे बिना बोले भी बातें हो सकती हैं , आप या शायद मेरे इक और मित्र भूपिंदर दत्त रहे हैं ऐसे।
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      आज से ब्लॉग पर इक नया भाग शुरू कर रहा हूं , " अदीब " शीर्षक नाम से।  आपसे ही शुरुआत करने जा रहा हूं , बहुत शेर याद हैं , मगर पास लिखी आपकी कोई पूरी ग़ज़ल नहीं है। इक पत्रिका से आपकी ये ग़ज़ल लेकर लिख रहा हूं सब से आपका परिचय कराते हुए।
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                   ग़ज़ल  ( प्रो जवाहर ठक्कर " ज़मीर "  )
जब से दुनिया खुदपरस्ती की दीवानी बन गई ,
इक खते तकसीम मुल्कों की निशानी बन गई।

इस कदर बदले क़वाईद आज की तालीम के ,
जिस्म आमिर बन गया और रूह फ़ानी बन गई।

तेरे करम को याद करता हूं तो ये कहता है दिल ,
ज़िंदगी अब तो किसी की मेहरबानी बन गई।

अपने घर को फूंक कर बोला कोई आतिश मिजाज़ ,
इस तरह मिटती है हर शै जो पुरानी बन गई।

आदमी की आदतों को जा-बी-जा देखा किया ,
जोड़ कर देखा उसे तो इक कहानी बन गई।

वो मेरे पहलू में थे तो था मुहब्बत का यकीं ,
गैर से की गुफ़्तगू तो बदगुमानी बन गई।

फासले रख कर तमाशा देखते हो तुम " ज़मीर " ,
पास से देखो ज़रा दुनिया सयानी बन गई।
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ठक्कर साहब ,
                   बहुत कुछ है जो समझते हैं हम दोनों मगर लिखने को अल्फ़ाज़ नहीं मिलते हैं , बस ऐसा ही है
हमारा नाता और रहेगा हमारे बाद भी। याद है आपने इक मिसरा मुझे दिया था ग़ज़ल लिखने को , जिस से मेरा पहला गीत बना था।  मुझे अपनी सैंकड़ों ग़ज़लों से अलग लगता है , मेरी खुद की पहचान जो शायद और कोई नहीं समझ पाया आपने समझा भी मुझे बताया भी :::::::::
                               " आंधियां चलती रहीं दीप जलता ही रहा "
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