Friday, 23 September 2016

कौन किसको समझे समझाये ( कविता ) भाग दो 122 ( डॉ लोक सेतिया )

आखिर ,
आज जान ही लिया मैंने ,
बेकार है ,
प्रयास करना भी।
यूं ही
अभी तलक मैंने ,
घुट घुट कर
ज़िंदगी बिताई ,
इस कोशिश में ,
कि कभी न कभी
मुझे समझेंगे ,
सभी दुनिया वाले।
शायद
अब खुद को खुद मैं ही
समझ सकूंगा ,
अच्छी तरह से
अपनी नज़र से
औरों की नज़रों को देख कर नहीं।
दुनिया
बुरा समझे मुझे , चाहे भला
नहीं पड़ेगा कोई अंतर उस से
मैं जो हूं , जैसा भी हूं
रहूंगा वही ही हमेशा
किसलिये खुद को ,
गलत समझूं
खुद अपनी ,
वास्तविकता को भुला कर।
नहीं अब और नहीं
समझाना किसी को भी
क्या हूं मैं ,
क्या नहीं हूं मैं
यूं भी किसको है ज़रूरत
फुर्सत भी किसे है यहां
दूसरे को समझने की
खुद अपने को ही ,
नहीं पहचानते जो
वही बतलाते हैं ,
औरों को उनकी पहचान
चलो यही बेहतर है ,
वो मुझसे उनसे मैं
रहें बनकर हमेशा ही ,
अजनबी अनजान।

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