Tuesday, 13 September 2016

इंतज़ार में है मंज़िल ( कविता ) भाग दो 121 ( डॉ लोक सेतिया )

कभी कभी सोचते हैं हम ,
क्या खोया है क्या पाया है ,
क्या यही था हमारा ध्येय ,
क्या यही थी हमारी मंज़िल ,
और शायद अक्सर सोच कर  ,
लगता है जैसे अभी तलक हम ,
भटकते ही फिरते हैं इधर उधर ,
बिना जाने बिना समझे ही शायद ,
रेगिस्तान में प्यासे मृग की तरह।
तब रुक कर करना चाहिये मंथन ,
आत्मचिंतन और विशलेषण ,
तभी कर सकेंगे ये निर्णय हम कि ,
किधर को जाना है अब हमें आगे  ,
और तय करना होगा फिर इक बार  ,
कौन सी है  मंज़िल कौन सी राह है ,
जिस पर चल  कर जाना है हमें।
आज कुछ ऐसी ही बात है मेरे साथ ,
सोचने पर समझ आया है मुझे भी ,
नहीं किया अभी तलक कुछ सार्थक ,
व्यतीत किया जीवन अपना निरर्थक ,
लेकिन मुझे ठहरना नहीं यहां  पर ,
चलना है चलते जाना है तलाश में ,
उस मंज़िल की जो कर रही  इंतज़ार ,
किसी मुसाफिर के आने का सदियों से।

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