Sunday, 26 June 2016

जुर्म हम लोग बस एक करते रहे ( ग़ज़ल 215 ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

जुर्म हम लोग बस एक करते रहे ,
अश्क़ पीते गये आह भरते रहे।
किस को झूठा कहें किस को सच्चा कहें ,
बात कर के सभी जब मुकरते रहे।
रात तूफान की बन गई ज़िंदगी ,
बिजलियों की चमक देख डरते रहे।
मुख़्तसर सी हमारी कहानी रही ,
जो बुने ख्वाब सारे बिखरते रहे।
हर कदम पर नये मोड़ आये मगर ,
हौंसलों के सफर कब ठहरते रहे।
लोग सब प्यार को जब लगे भूलने ,
दो सितारे ज़मीं पर उतरते रहे।
कुछ सितमगर सितम रोज़ ढाते रहे ,
और इल्ज़ाम "तनहा " पे धरते रहे।

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