Sunday, 8 May 2016

मुझे सज़ा दे दो ( मंथन ) 118 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कब से खड़ा हूं कटघरे में ,
सुन रहा हूं इल्ज़ाम सभी के ,
सर झुकाये खड़ा हुआ हूं ,
नहीं है कोई भी जवाब देने  को ,
मानता हूं नहीं पूरे कर पाया ,
सभी अपनों के अरमानों को ,
हो नहीं सका कभी भी जीवन में सफल ,
टूट गये सभी ख्वाब मेरे।
कभी कभी सुनता हूं ,
किसी को हर कदम ,
किसी ने दिया प्रोत्साहन ,
कुछ भी करने को देकर बढ़ावा ,
किया भरोसा ,
उसकी काबलियत पर ,
लगता है तब मुझे कि
शायद कोई तो कभी ,
मुझे भी कह देता प्यार से ,
बेशक सारी दुनिया
तुमको समझती है ,
नासमझ और नाकाबिल ,
मुझे विश्वास है
तुम्हारी लगन ,
और कभी हार नहीं मानने की आदत पर।
बस इतना ही मिल जाता
तो शायद मैं कभी भी ,
नहीं होता नाकामयाब ,
कैसे समझाता किसी को
किसलिये हमेशा रहा ,
डरा सहमा उम्र भर ,
मेरा आत्मविश्वास
बचपन से ही कभी ,
उठ नहीं सका ऊपर ,
खुद को समझता रहा मैं
अवांछित हर दिन हर जगह हमेशा।
इक ऐसा पौधा ,
जो शायद उग आया
अनचाहे किसी वीरान जगह पर ,
जहां कोई नहीं था ,
देखभाल करने वाला ,
बचाने वाला आंधी तूफान से ,
हर कोई कुचलता रहा ,
रौंदता रहा मुझे ,
बेदर्दी से कदमों तले ,
कोई बाड़ नहीं थी ,
मुझे बचाने को ,
बेरहम ज़माने की ठोकरों से ,
बार बार उजड़ता रहा
फिर फिर पनपता ही रहा ,
अपनी बाकी जड़ों से ,
और बहुत बौना बन कर रह गया ,
इक पौधा जिस पर थे सूखे पत्ते ही।
कभी ऐसा भी हुआ ,
जिनको मुझ से ,
कोई सरोकार ही नहीं ,
किसी तरह का ,
उनकी नज़रों में भी
मुझे नज़र आती रही हिकारत
छिपी मीठी बातों में भी ,
किसलिये लोग अकारण ही
किया करते हैं मुझ जैसों को प्रताड़ित ,
जाने क्या मिलता उनको
औरों का दिल दुखा कर हमेशा।
चाहता था मैं भी सफल होना ,
सभी की उम्मीदों पर ,
खरा साबित होना ,
शायद ज़रूर हो जाता कामयाब
जीवन में अगर ,
कोई एक होता जो ,
मुझे समझता ,
मुझे परोत्साहित करता ,
मेरा यकीन करता ,
और मैं कर सकता
हर वो काम जो ,
कभी नहीं कर पाया आज तक।
मगर आज मुझे नहीं देनी
कोई भी सफाई ,
अपनी बेगुनाही की ,
खड़ा हूं बना मुजरिम
सभी की अदालत में ,
कटघरे में सर झुकाये।
मांगता हूं सज़ा
अपने सभी किये अनकिये ,
अपराधों की खुद ही ,
मुझे सज़ा दो जो भी
चाहो मुझे मंज़ूर है ,
आपकी हर सज़ा मगर ,
बस अब ,
अंतिम पहर है जीवन का ,
बंद कर दो ,
और आरोप लगाना ,
गुनहगार हूं मैं ,
मुझे नहीं मालूम ,
क्या अपराध है मेरा ,
शायद जीना।

1 comment:

sunita agarwal said...

ओह मार्मिक रचना।