Sunday, 17 April 2016

तुझसे कि खुद अपने आप से ( गुज़ारिश ) 117 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

गुज़ारिश तुझसे कि अपने आप से ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

सारी उम्र यही होता रहा ,
मुझे क्या पता ,
कौन करता रहा।

हर कदम ,
निराशा ,
हताशा ,
इक जंग किसी तरह जीने को।

जाने ये क्या है ,
मेरी नाकामी मेरी काबलियत की कमी ,
अथवा मेरी बदनसीबी।

ज़िंदगी में कभी भी ,
कुछ भी जो चाहा मैंने ,
मिला नहीं मुझे।

प्यार नहीं पैसा नहीं ,
नाम नहीं शोहरत नहीं।

इक उम्मीद फिर भी ,
जगाता रहा मैं किसी न किसी तरह ,
कि एक दिन सब बदलेगा ,
बदलना है मुझे।

बहुत किया विश्वास ,
मांगी हर दिन दुआ भी ,
करता रहा प्रार्थना परमात्मा से।

नहीं सुनी जाने क्यों ,
तुमने मेरी कभी फरियाद ,
नहीं हुआ मुझ पर कभी दयालु तू।

माना नहीं जीता कभी मैं ,
मगर मानी नहीं कभी हार भी ,
बिना तकदीर के सहारे भी जिया हूं मैं।

शायद मुझे छोड़ देनी चाहिए ,
अब जीने की हर इक उम्मीद ,
मगर नहीं टूटी अभी भी मेरी आशा।

मेरी कहानी में ,
बेशक नहीं होगा कोई सबक ,
जंग जीतने का ,
लेकिन मेरी जंग कभी ,
थमी नहीं होगी जीते जी।

कोई आगाज़ नहीं था मेरा ,
कुछ भी नहीं रहा बीच में ,
विस्तार या ऊंचाई ,
फिर भी इक अंत ,
ज़रूर होगा मेरा जानता हूं।

शायद कोई नहीं जानता ,
जीने के लिये कैसे खुद को और सभी को ,
छलता रहा हूं मैं ,
जो नहीं वो होने का आडंबर करके।

अगर तू है विधाता कहीं पर कोई ,
तो तू समझता होगा ,
मेरी हर परेशानी ,
जो मेरे सिवा नहीं समझा कोई भी दुनिया में।

ये मेरी शिकायत है या प्रार्थना ,
तुझ से है या फिर ,
खुद अपने आप से ,
नहीं मालूम मुझे ,
क्या मालूम है तुझे ऐ खुदा।

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