Sunday, 20 March 2016

खुश्क हैं आंखें जुबां खामोश है ( ग़ज़ल 216 ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

खुश्क हैं आंखें जुबां खामोश है ,
इश्क़ की हर दास्तां खामोश है।
बस तुम्हीं करते रहे रौशन जहां ,
तुम नहीं , सारा जहां खामोश है।
क्या बताएं क्या हुआ सबको यहां ,
चुप ज़मीं है आस्मां खामोश है।
झूमता आता नज़र था रात दिन ,
आज पूरा कारवां खामोश है।
तू हमारे वक़्त की आवाज़ है ,
किसलिए तूं जानेजां खामोश है।

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