Saturday, 15 August 2015

ग़ज़ल 214 "महिलाओं के नाम" ( ज़माने को बदलना है , नई दुनिया बसाना है )

ज़माने को बदलना है , नई दुनिया बसाना है ,
उठा कर हाथ अपने , चांद -तारे तोड़ लाना है।
कभी महलों की चाहत में , भटकती भी रही हूं मैं ,
नहीं पर चैन महलों में , वो कैसा आशियाना है।
मुझे मालूम है , तुम , क्यों बड़ी तारीफ़ करते हो ,
नहीं कुछ मुझको देना , और सब मुझसे चुराना है।
इसे क्या ज़िंदगी समझूं , डरी सहमी सदा रहती ,
भुला कर दर्द सब , बस अब ख़ुशी के गीत गाना है।
मुझे लड़ना पड़ेगा , इन हवाओं से ज़माने की ,
बुझे सारे उम्मीदों के चिरागों को जलाना है।
नहीं कोई सहारा चाहिए मुझको , सुनो लोगो ,
ज़माना क्या कहेगा , सोचना , अब भूल जाना है।
नहीं मेरी मुहब्बत में बनाना ताज तुम कोई ,
लिखो "तनहा" नया कोई हुआ किस्सा पुराना है।

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