Saturday, 7 March 2015

ग़ज़ल 218 ( अभी बाकी यही इक काम करना है )

अभी बाकी यही इक काम करना है ,
हमें तकदीर को फिर से बदलना है।

चहक कर सब परिंदे कह रहे सुन लो ,
उन्हें हर आस्मां छूकर उरतना है।

यही इक बात सीखी आज तक हमने ,
न कह कर बात से अपनी मुकरना है।

न भाता आईना उनको कभी लेकिन ,
उन्हें सज धज के घर से भी निकलना है।

हमारी प्यास बेशक बुझ नहीं पाई ,
हमें बन कर घटा इक दिन बरसना है।

उसी से ज़िंदगी का रास्ता पूछा ,
कि जिसके हाथ से बेमौत मरना है।

नई दुनिया बसाओ खुद कहीं "तनहा" ,
हुआ मुश्किल यहां पल भर ठहरना है।