Sunday, 8 March 2015

ग़ज़ल 217 ( कहां तेरी हकीकत जानते हम हैं )

कहां तेरी हक़ीकत जानते हम हैं ,
बिना समझे तुझे पर पूजते हम हैं।

नहीं फरियाद करनी , तुम सज़ा दे दो ,
किया है जुर्म हमने , मानते हम हैं।

तमाशा बन गई अब ज़िंदगी अपनी ,
खड़े चुपचाप उसको देखते हम हैं।

कहां हम हैं , कहां अपना जहां सारा ,
यही इक बात हरदम सोचते हम हैं।

मुहब्बत खुशियों से ही नहीं करते ,
मिले जो दर्द उनको चाहते हम हैं।

यही सबको शिकायत इक रही हमसे ,
किसी से भी नहीं कुछ मांगते हम हैं।

वो सारे दोस्त "तनहा"खो गये कैसे ,
ये अपने आप से अब पूछते हम हैं।

Saturday, 7 March 2015

ग़ज़ल 218 ( अभी बाकी यही इक काम करना है )

अभी बाकी यही इक काम करना है ,
हमें तकदीर को फिर से बदलना है।

चहक कर सब परिंदे कह रहे सुन लो ,
उन्हें हर आस्मां छूकर उरतना है।

यही इक बात सीखी आज तक हमने ,
न कह कर बात से अपनी मुकरना है।

न भाता आईना उनको कभी लेकिन ,
उन्हें सज धज के घर से भी निकलना है।

हमारी प्यास बेशक बुझ नहीं पाई ,
हमें बन कर घटा इक दिन बरसना है।

उसी से ज़िंदगी का रास्ता पूछा ,
कि जिसके हाथ से बेमौत मरना है।

नई दुनिया बसाओ खुद कहीं "तनहा" ,
हुआ मुश्किल यहां पल भर ठहरना है।