Sunday, 7 December 2014

रिश्तों की डोरी ( कविता ) 108 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कभी देखा है ,
धागे जब उलझ जाते हैं ,
बहुत कठिन हो जाता है ,
उनको बचाकर अलग करना ,
ज़रा सा खींचा कोई धागा ,
टूट जाता है पल भर में ,
इक थोड़ा सा खींचने मात्र से।
जीवन में रिश्ते नाते सभी ,
रहते हैं इक साथ ऐसे ही ,
हम सभी के अपने ही हाथों में ,
खोना नहीं चाहते हैं किसी को भी ,
मगर ज़रा सी भूल से हो जाता है ,
अक्सर ऐसा भी हम सभी से ,
कोई इक रिश्ता उलझ जाता है ,
अपने किसी दूसरे रिश्ते से अचानक ,
नहीं आता सभी को ये काम ,
हर रिश्ते नाते को बचाकर रखना।
मिलना जाकर किसी दिन इक बुनकर से ,
देखना उसको बुनते हुए धागों से ,
कितने रंग वाले ,
कैसे कैसे होते हैं ,
सब को अपनी जगह पर रखता ,
सब को उतना ही कसता जितना ज़रूरी ,
सभी में रखता है थोड़ी थोड़ी सी दूरी ,
कोई धागा नहीं उलझने देता वो ,
टूटने नहीं देता इक भी धागा ,
और कभी कोई टूट भी जाता है ,
थोड़ा अधिक खींचने से अचानक ,
तब उसको अलग रखता दूसरे धागों से ,
गांठ नहीं लगता है कभी बुनकर ,
प्यार से उसी धागे के दोनों सिरे ,
फिर से मिला देता उनको कैसे ,
कभी टूटा ही नहीं था वो जैसे।
दोस्तो सीखना सभी बुनकर से ,
प्यार मुहब्बत दोस्ती वाले सब रिश्ते ,
कैसे रखने हैं सभी हमने संभाल कर ,
और उस से बुनना है अपना जीवन ,
किसी खूबसूरत चादर की तरह ,
जिस में मिलकर हर धागा देता है ,
बहुत ही सुंदर शक्ल।

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