Monday, 24 November 2014

कैद ( कविता ) 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

जाने कब से बंद थे ,
हम खुद अपनी ही कैद में ,
छटपटाते रहे अब तक ,
रिहाई के लिये हर दिन ,
किया ही नहीं हमने कभी ,
मुक्त होने का प्रयास भी ,
समझते रहे अपनी कैद को ,
अपने लिये इक सुरक्षा कवच।
जानते थे ये भी हम कि ,
जीने के लिये निकलना ही होगा ,
इस अनचाही कैद से इक दिन ,
मगर देखते रहे इक सपना कि ,
आयेगा कभी कोई मसीहा ,
मुक्त करवाने हमको ,
खुद अपनी ही कैद से।
तकदीर ने शायद हमको ,
दिखलाया है रास्ता ,
बंधनमुक्त होने का ,
और खुद हमने थामा है ,
इक दूजे का हाथ ,
और तब नहीं है बाकी कोई निशां ,
अपनी निराशा और तनहाई ,
की खुद ही बनाई उस कैद का।
संग संग उड़ रहे हैं हम ,
और खुले गगन में ,
चले हैं छूने प्यार में ,
आकाश की नई ऊंचाई को ,
गा रहे हैं अब गीत ख़ुशी के।

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