Wednesday, 1 October 2014

ग़ज़ल 213 ( अब यही ज़िंदगी अब यही बंदगी ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

अब यही ज़िंदगी , अब यही बंदगी ,
प्यार की जब हमें भा गई बेखुदी।
आपके वास्ते ग़ज़ल कहने लगे ,
थी हमारी मगर हो गई आपकी।
इश्क़ करना नहीं जानते हम अभी ,
खुद सिखा दो तुम्हीं कुछ हमें आशिक़ी।
पास आओ करें बात भी प्यार की ,
छांव कर दो ज़रा खोल दो ज़ुल्फ़ भी।
वक़्त मिलने का तुम भूल जाना नहीं ,
रोज़ मिलते वही याद रखना घड़ी।
किस तरह हम कहें बात दिल की तुम्हें ,
आप सुनते कहां बात पूरी कभी।
जब से "तनहा" दिवाना हुआ आपका ,
भूल जाती उसे बात बाकी सभी।

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