Thursday, 11 September 2014

जीवन की पहचान ( कविता ) 106 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कभी सोचा है ,
कभी जाना है ,
खुद को कब ,
पहचाना है।
ये टेड़ी सीधी ,
जीवन की राहें ,
जाती हैं किधर ,
किधर जाना है।
खुद को खिलाड़ी ,
समझने वालो ,
कोई खेल रहा है ,
और खेलते जाना है।
तकदीर का लिखा ,
न जनता कोई भी ,
लकीरें हैं पानी पे ,
बस उसको मिटाना है।
इक नाटक है ज़िंदगी ,
किरदार सभी इसमें ,
जब तक हैं पर्दे पर ,
किरदार निभाना है।
औरों से शिकवा ,
खुद से गिला करना ,
हासिल नहीं कुछ भी ,
झूठा ही बहाना है।
जीने का तरीका ,
केवल है इतना ही ,
खोना है खुद को जब ,
तब ही सब पाना है। 

No comments: