Monday, 21 July 2014

ग़ज़ल 212 ( झूठ से दोसती नहीं करते ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

झूठ से दोस्ती नहीं करते ,
हम कभी बस यही नहीं करते।
इक खुदा ने सवाल पूछा है ,
आप क्यों बंदगी नहीं करते।
साथ जीना है साथ मरना भी ,
बस तभी ख़ुदकुशी नहीं करते।
बेवफ़ा हम उन्हें कहें कैसे ,
बेवफ़ाई वही नहीं करते।
आज कहने लगे हमें आकर ,
आप क्यों आशिक़ी नहीं करते।
क्यों बुलाते हो तुम रकीबों को ,
यार से दिल्लगी नहीं करते।
याद "तनहा" उन्हें ज़माना सब ,
बात पर आपकी नहीं करते।