Monday, 12 May 2014

ग़ज़ल ( इश्क में रात दिन आह भरते रहे ) 2 1 1

इश्क़ में रात दिन आह भरते रहे ,
वो अभी आएंगे राह तकते रहे।
सबकी नज़रें उधर देखती रह गईं ,
हम झुकी उस नज़र पर ही मरते रहे।
चुप रहे हम नहीं कुछ भी बोले कभी ,
बात करते रहे खुद मुकरते रहे।
पांव जलते गये , खार चुभते रहे ,
राह से इश्क़ की हम गुज़रते रहे।
आपसे कर सके  हम न फरियाद तक ,
ज़ख्म खाते गये , अश्क़ झरते रहे।
किसलिये देखते हम भला आईना ,
देखकर आपको हम संवरते रहे।
तोड़ दीवार दुनिया की मिलने गये ,
फिर भी इल्ज़ाम "तनहा" कि डरते रहे।