Monday, 12 May 2014

ग़ज़ल 2 1 1 ( इश्क़ में रात दिन आह भरते रहे ) - लोक सेतिया "तनहा"

 इश्क़ में रात दिन आह भरते रहे - लोक सेतिया "तनहा"

इश्क़ में रात दिन आह भरते रहे ,
वो अभी आएंगे राह तकते रहे।

सबकी नज़रें उधर देखती रह गईं ,
हम झुकी उस नज़र पर ही मरते रहे।

चुप रहे हम नहीं कुछ भी बोले कभी ,
बात करते रहे खुद मुकरते रहे।

पांव जलते गये , खार चुभते रहे ,
राह से इश्क़ की हम गुज़रते रहे।

आपसे कर सके  हम न फरियाद तक ,
ज़ख्म खाते गये , अश्क़ झरते रहे।

किसलिये देखते हम भला आईना ,
देखकर आपको हम संवरते रहे।

तोड़ दीवार दुनिया की मिलने गये ,
फिर भी इल्ज़ाम "तनहा" कि डरते रहे।