Saturday, 5 April 2014

नेताओं के गुण ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

कौन है जो सफेद झूठ भी बोलता है और सत्यवादी होने का दम भी भरता है। जो हर दिन भ्रष्टाचार करने के साथ साथ ईमानदारी पर भाषण दे सकता है। किसी को खुद अपने हाथ से क़त्ल करने के बाद उसकी लाश पर आंसू बहा सकता है। जिसके कंधे पर चढ़ कर ऊपर पहुंचा उसी को लात मार सकता है। अपने दुश्मनों से हंस हंस कर गले मिल सकता है और जिसको दोस्त बताता है उसी की पीठ में छुरा घोंप सकता है। देश को लूट कर रसातल में धकेलता हुआ भी देशभक्त कहलाता है। जो पानी को आग लगा सकता है , अमृत को विष बना सकता है। जिसको देख चोर डाकू लुटेरे भी थर थर कांपने लगते हैं। जिसका कोई दीन नहीं ईमान नहीं फिर भी हर धर्म की सभा में जिसका सम्मान किया जाता है। जिसके भीतर नफरत क्रोध अहंकार कूट कूट कर भरा होता है मगर उसके चेहरे पर मुस्कान रहती है बोल चाल में शराफत छलकती है। जो तमाम अपकर्म , काले कारनामे करता है फिर भी हमेशा चकाचक सफेद वस्त्रों में बेदाग़ नज़र आता है। जिसका आदर्श वाक्य है , बाप बड़ा न भईया , सब से बड़ा रुपया। जो खुद को हर विषय का जानकार बताता है जबकि उसको अपने स्वार्थ को छोड़ कुछ भी समझ नहीं आता है। खुद को महान समझता है और अपने घोटालों को देश सेवा और विकास बताता है। इंसान होने के बावजूद जिसमें इंसानियत का कोई नाम तक नहीं है। जो बाकी लोगों को कानून का पालन करने को कहता है मगर खुद किसी नियम कायदे कानून को कभी नहीं मानता। लोकतंत्र की आड़ में जो तानाशाही कायम कर अपने परिवार के हित को साधता रहता है लोक हित घोषित करता हुआ। करोड़ों का गोलमाल करने के बाद भी जो निर्दोष साबित हो साफ बरी हो जाता है और इसको न्याय की जीत कहता है। वो जब साम्प्रदायिक सद्भाव कायम रखने को भाषण देता है तब दंगा-फसाद करवा सकता है। जो दावा करता है कि उसको कुर्सी का कोई मोह नहीं है मगर पद हासिल करने को किसी भी हद तक जा सकता है। कुर्सी बिना जल बिन मछली सा तड़पता है और उसे पाने को सब हथकंडे अपनाता है। जिसको पापों से इस देश की धरती दबी हुई है फिर भी उससे मुक्ति का कोई रास्ता नज़र नहीं आता है। जिसकी कोई विचारधारा नहीं है सत्ता पाना ही एकमात्र ध्येय है जिसका। जो खुद को भाग्य विधाता और जनता को मूर्ख समझता है। गिरगिट की तरह जिसको रंग बदलना आता है। जो चोर से भाईचारा निभाता है बचाने का रास्ता बता कर और साहूकार के घर जाकर वादा करता है चोर को पकड़वाने और सज़ा दिलाने का। अर्थात जिसमें ये सभी अवगुण भरे पड़े हैं तब भी सर्वगुणसम्पन कहलाता है। वह नेता है।
                  नेता केवल नेता होता है , वह न किसी का भाई होता है न किसी का बेटा न ही बाप। वो न किसी का शुभचिंतक है न ही किसी का मित्र।  आदमी होने के बावजूद जो बिच्छू के समान सवभाव वाला हो वही नेता बनता है। वो व्यक्ति दुनिया का सब से खुशनसीब है जिसको कभी किसी नेता से मिलने की ज़रूरत नहीं पड़ी हो। भगवान भी पछता रहा होगा नेता को बनाकर , मगर अब उसपर भगवान का भी कोई बस नहीं चलता है। जो अपने मतलब के बिना अपने बनाने वाले को भी पहचानने से इनकार कर सकता है , ज़रूरत के समय बाप को गधा और गधे को भी बाप बताने वाला ही नेता होता है। इस पहचान को कभी भुलाना नहीं , बचना कहीं आपके आस पास कोई ऐसा खतरनाक प्राणी तो नहीं रहता।  

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