Sunday, 2 March 2014

ज़िंदगी के दो किनारे ( तरकश ) डा लोक सेतिया

ज़िंदगी इक बहते हुए पानी की नदी है जिसके दो किनारे होते हैं। शादी इस तरफ का किनारा है तो प्यार इश्क़ मुहब्बत उस दूसरी तरफ का किनारा। साफ बात तो ये है कि शादी और प्यार मुहब्बत दो अलग अलग चीज़ें हैं। जाने क्यों कुछ लोग गुमराह करते हैं ये समझा कर कि प्यार करने वालों को विवाह के बंधन में बंध जाना चाहिये , कुछ लोग ये अफवाह भी फैलाते हैं कि शादी कर ली जिस किसी से उसी से प्यार खुद -ब -खुद हो ही जाता है। सच कहा जाये तो शादी और इश्क़ दोनों दुनिया की सब से गंभीर समस्याओं के नाम हैं जिनका आज तक हल कोई भी खोज नहीं पाया है। ये सवाल बेहद कठिन है कि जो एक दूसरे को सच्चा प्यार करते हों उनको आपस में शादी करनी चाहिये या नहीं। देखा जाये तो जिसे सच्चा प्यार करते हैं उसकी भलाई चाहते हैं तो उसको आज़ाद ही रहने देना चाहिये , बंधन में जकड़ कर खुद ही अपने प्रेम का गला न दबायें। उम्र भर साथ जीने मरने का शौक आप दोनों के सपनों को बिखर जाने टूट कर चूर चूर होने का कारण बन सकता है। जैसे कोई अदालत किसी बेगुनाह को सूली पर चढ़ाने के बाद किसी भी तरह भूल सुधार नहीं कर सकती , किसी को फिर से जिवित नहीं कर सकती उसी तरह शादी की गलती को भी सुधारा नहीं जा सकता है। शादी करने के बाद तलाक लेना देना भी इक नई गलती है न कि पहली गलती को सुधारना। शादी एक ऐसा चक्रव्यूह है जिस से कोई अभिमन्यु बाहर नहीं निकल पाता है एक बार फस जाने के बाद।
                 ऐसा लगता है कि विवाह की परंपरा कुछ लोगों ने अपना कारोबार चलाने को शुरू की होगी। बैंड बाजे वाले , टेंट वाले , हलवाई , रौशनी करने के काम में लगे लोग यही चाहते हैं कि हर दिन ऐसा कुछ न कुछ चलता ही रहे। कभी नाई और पंडित किया करते थे कुंवारों को सपनों के जाल में उलझाने का काम तो आजकल मैरिज ब्यूरो से लेकर इंटरनेट तक हर तरफ जाल ही जाल बिछा रखा है। अब कोई बच कर जाये तो जाये किधर। शायद मन पसंद वर वधू की तलाश करना दुनिया का सब से कठिन कार्य है , लगभग असंभव। इक सिनेमा की नायिका ने कई साल पहले टीवी पर शो शुरू किया था जोड़ियां बनाने का। "कहीं न कहीं कोई है " नाम सुनते ही सिरहन सी होती थी , मुझे तो ये किसी हॉरर फिल्म का शीर्षक लगता था। मैं उस कार्यकर्म को देखने का साहस कभी नहीं कर पाया था। बाद में भी टीवी पर सवयंबर होते रहे किसी तमाशे की तरह। जिस नायिका ने शुरुआत की थी उसको जीवन साथी विदेश में कहीं मिल सका। अब सब लोग तो देस को छोड़ परदेस नहीं जा सकते , यहां की नायिका तो हर दम गुनगुनाती है "परदेसियों से न अखियां मिलाना "।
                 अपने जीवन साथी को लेकर सभी की मधुर कल्पना होती है। कौवा भी खुद को हंस समझ कर सच्चे मोती की तलाश करता है। हर लड़का हर लड़की अपने लिये हज़ारों नहीं लाखों में एक की तलाश करते हैं। जब किसी को चुन कर विवाह कर लेते हैं तब पता चलता है कि जल्दबाज़ी में सही निर्णय नहीं लिया जा सका। तब पछताये कुछ हासिल नहीं होता , चुप रहने में ही भलाई है , गले पड़ा ढोल बजाना पड़ता है उम्र भर। असली ज़िंदगी में सपनों की हसीन दुनिया का नामो-निशान तक नज़र आता नहीं। दूर के ढोल सुहावने लगते हैं इसका पता पति पत्नी दोनों को बहुत जल्द चल जाता है। कुछ लोग शादी को दो दिलों का मिलन समझते हैं , कुछ इसको शुद्ध लेन देन का इक कारोबार। दहेज की कीमत चुकाने के बाद ही दूल्हा खरीदा जाता है। शादी में रिश्तेदार और जान पहचान वाले सभी बुलाये जाते हैं ये खबर देने को कि दो लोग आज से कुंवारे नहीं रह गये हैं। जैसे किसी शोरूम में कोई माल सोल्ड का लेबल चिपका कर रखा हो , उसको कोई खरीदने की बात नहीं कर सकता। आजकल अच्छे दूल्हे का खरीदार ही नहीं मिलता , कितने दूल्हे बिक्री के लिये शोरूम में रखे रहते हैं। यूं शादी करने को उम्र की कोई सीमा तो नहीं होती लेकिन इक उम्र के बाद डिमांड खत्म हो जाती है। सब कुछ की चाहत में कुछ भी हासिल नहीं होता। मूर्ख लोग ही दोबारा शादी किया करते हैं , उनके लिये रिजेक्टेड माल ही उपलब्ध होता है। तब लगता है कि पहली वाली इससे अच्छी थी , तलाक नहीं देना था।
                      टीवी सीरियल की बात और है। उनके पास विषय ही यही बचा है , शादीशुदा नायक की कुंवारी प्रेमिका या किसी कुंवारे का विवाहित पर फिदा होना। असल जीवन में सब को नयापन ही पसंद होता है। असली ज़िंदगी में शादी भी मुश्किल से हो पाती है और तलाक तो बहुत ही मुश्किल। लेकिन फ़िल्म वालों की कहानी में और टीवी सीरियल में कुछ कागज़ों पर हस्ताक्षर करते ही तलाक हो जाता है। कई सीरियल में दर्शक याद तक नहीं रख सकते कि कब कौन किसका पति था , कौन किसकी पत्नी और अब किसका किससे क्या रिश्ता हो गया है। आजकल प्रेम विवाह का प्रचलन बढ़ गया है ऑनर किलिंग्स के बावजूद। लेकिन अब प्रेम भावनात्मक नहीं रह गया है , बिना सोचे समझे नहीं होता , ठोक बजा कर किया जाता है। पुराने युग का इश्क़ केवल कहानियों तक सिमित हो गया है। इस दौर के आशिक़ तू नहीं और सही में यकीन रखते हैं। शायद ये जान चुके हैं कि ये इश्क़ नहीं आसां। सच तो ये है कि शादी और प्यार मुहब्बत नदी के दो किनारों की तरह है , इनके बीच बने पुल अधिक दिन तक टिका नहीं करते।