Wednesday, 30 October 2013

कारोबार ( लघुकथा )

प्रकाशक जी बोले , मैंने आपकी ग़ज़लें पढ़ ली हैं , बहुत ही अच्छे स्तर की रचनाएं हैं। मुझे आपका ग़ज़ल संग्रह छाप कर बेहद ख़ुशी होगी। मगर आपको हमें दो सौ पुस्तकों का मूल्य अग्रिम देना होगा , छपने पर आपको दो सौ किताबें भेज दी जायेंगी। शायर हैरान हो गया , बोला प्रकाशक जी अभी कुछ दिन पूर्व मेरे दो मित्रों की पुस्तकें आपने प्रकाशित की हैं और उनसे आपने एक भी पैसा नहीं लिया है। क्या आपको उन दोनों की ग़ज़लें अधिक पसंद आई थी।
       प्काशक जी हंस कर बोले , वो बात नहीं है। सच कहूं तो आपकी रचनायें उन दोनों से कहीं अधिक पसंद आई हैं मुझे। मगर साफ कहूं तो उनकी किताबें बिना कुछ लिये छापना हमारी मज़बूरी थी , इसलिये कि वो दोनों ही हर वर्ष अपने अपने कालेज की लायब्रेरी के लिये हज़ारों की पुस्तकें हमारे प्रकाशन से खरीदते हैं। अब आप से हमें ऐसा कोई सहयोग मिल नहीं सकता इसलिये अपनी किताब छपवानी है तो आपको ये करना ही होगा। आपकी पुस्तक छापना हमारी मज़बूरी नहीं है। आपकी पुस्तक छापना  हमारे लिये केवल कारोबार है। आप हमसे छपवाना चाहते हों मोल चुका कर तो हमें बेहद ख़ुशी होगी। 

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