Monday, 7 October 2013

कला निकली जब भी बिकने ( कविता ) 104 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

मेला सजाया गया था रात ,
सज कर आई थी उसकी बरात ,
झूम झूम कर कला खुद नाची ,
फूलों की हो रही थी वो बरसात।
सुबह था बदला सा नज़ारा ,
जो भी सजाया बिखरा था सारा ,
कला का ज़ख़्मी था पूरा बदन ,
बन कर अपने सब ने ही मारा।
जाने था कैसा ये उसका सम्मान ,
जो बन गया जैसे हो कोई अपमान ,
फिर से वही तलवे चाटना सबके ,
बस दो पल की थी झूठी शान।
किस बात पे थी यूं इतना इतराई ,
क्या नया थी तू ले कर आई ,
तेरा मोल लगाने लगे लोग ,
रो रो कह रही थी शहनाई।
कल तक जिनको बुरा थी कहती ,
नहीं कभी जिनके घर में रहती ,
उनको ही अपना खुदा बनाया ,
हमने भी देखी उलटी गंगा बहती।
खुद को किया है जिनके हवाले ,
करते निसदिन वो हैं घोटाले ,
उनको नज़र आता जिस्म नग्न ,
नहीं देखते पांव के कभी छाले।
कला नहीं बाज़ार में कभी जाना ,
चाहे रूखी सूखी ही खाना ,
छूना मत गंदगी को भूले से ,
इन धोकों से खुद को है बचाना।

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