Thursday, 3 October 2013

हुस्न वालो हुस्न की सुनो कहानी ( हास्य कविता ) 17 भग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

किसलिये परेशान है , पूरा किया अरमान है ,
जादू चले तेरे हुस्न का , पाया यही वरदान है ,
सब देखते हैं प्यार से , पाना सभी हैं चाहते ,
खुद मांगती थी यही , क्यों बन रही नादान है।
कहानी बड़ी पुरानी , सुनाती थी सबकी नानी ,
औरत बना खुदा से , हुई थी इक नादानी ,
अपनी तराशी मूरत पे , वो हो गया था आशिक ,
बस तभी से हर नारी , करती है सदा मनमानी।
खुदा को खुश किया था , चाहा जो वर लिया था ,
मेरे हुस्न पर सब फ़िदा हों , कहते दिलरुबा हों ,
हर बात मेरी मानें , मेरा झूठ भी सच जानें ,
मेरे हुस्न का जादू , क्या है न कोई पहचाने।
सब बात मान ली थी , इक बात थी बताई ,
सब तुझ पे आशिक हों , न खुद पे आप होना ,
खुद को हसीन समझा , तो उम्र भर को रोना ,
अपनी नज़र से बचना , इसमें तेरी भलाई।
ये बात हर नारी को , न कभी याद है आती ,
खुद देखती आईना , खुद से भी शर्माती ,
सजती और संवरती , कर कर जतन कितने ,
मुझसे हसीं न हो और , सोच कर ये घबराती।
सजने संवरने में वो , भूली खुदा की बात है ,
चार दिन की चांदनी , फिर अँधेरी रात है ,
उम्र छिपाती है अपनी , अपने ही आशिक से ,
चालीस की होने पर है , अभी तीस ये बताती।
तेरी नज़र का जादू अब , कितने दिन है बाकी ,
मय छोड़ दे ज़माना , ऐसे पिलाओ तुम साकी ,
दिल को संभालें कैसे , हम तो सिर्फ आदमी हैं ,
तुझ पर हुआ था आशिक , खुदा में रही कमी है।
सारी हसीनों से सब आशिक , फरियाद कर रहे ,
हमको बचा लो तुम ही , तुम पे ही सब मर रहे ,
ये सोच लो बिन हमारे , बहुत ही पछताओगी ,
कब तक खुद को खुद ही , देख देख दिल बहलाओगी।   

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