Tuesday, 17 September 2013

निभा सको अगर करना मुहब्बत ( कविता ) 102 ( डॉ लोक सेतिया )

मैं नहीं जनता ,
क्या तुम ,
कोई अप्सरा हो ,
स्वर्ग की ,
मेनका की तरह ,
मगर मुझे ,
मालूम है ,
मैं कोई विश्वामित्र ,
नहीं हूं ,
मैं कोई तपस्या ,
नहीं कर रहा था ,
किसी इंद्रलोक का ,
राज पाने के लिये ,
मैं तो इक इंसान हूं ,
धरती की दुनिया का ,
और तमाम उम्र ,
तरसता रहा मैं   ,
किसी के प्यार को ,
तुम मिल गई मुझे ,
यूं ही सरे राह चलते ,
और में आवाक ,
देखता रह गया तुम्हें ,
अपनी तकदीर पर ,
भरोसा नहीं मुझको ,
छलती रही है मुझे ,
बार बार उम्र भर ,
डरता रहा हूं मैं ,
खूबसूरत अपसराओं से ,
खुद को नहीं समझा ,
इस काबिल कभी मैंने ,
कि कोई अप्सरा ,
मुझसे करने लगे प्यार ,
टूटा हूं जाने कितनी बार ,
ज़माने की बेवफाई से ,
अब के टूटा तो ,
बिखर ही जाऊंगा ,
रेत के घर जैसा ,
इसलिये किसी भी ,
प्यार के बंधन में ,
बंधने से पहले ,
चाहता हूं पूछना ,
अपना सवाल ,
फिर तुम से इक बार ,
क्या वास्तव में ,
तुमको मुझसे ,
हो गया है सच्चा प्यार ,
मुझे नहीं रहा खुद पर ,
तुमको तो है न  ,
अपने पर ऐतबार !
चाहो तो अभी आज  ,
मुझे बेशक ,
कर दो इनकार ,
निभा सको हमेशा ,
तभी करना ,
प्यार का इज़हार !

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