Wednesday, 11 September 2013

धुंधली धुंधली यादें ( कविता ) 1 0 1 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

क्या क्या ,
लिखा था ,
हर इक वर्क पर ,
कितने बरसों तक ,
रखी थी ,
संभाल कर ,
अपनी निजि ,
डायरी मैंने।
कितनी कवितायें ,
कितनी ग़ज़ल ,
कितने नाम ,
कितनी तारीखें ,
कितनी प्यार की बातें।
इक इक शब्द में ,
छुपी हुई थी कोई ,
जीवन की कहानी ,
जो जानता था मैं ,
और जानता नहीं था ,
कोई भी दूसरा।
पढ़ भी लेता अगर ,
समझ नहीं पाता कभी ,
छुपे हैं उनमें मेरे ,
कैसे कैसे मधुर एहसास ,
कभी पढ़ ही कहां पाया ,
लिखा हुआ था सब ,
जिसके भी नाम ,
मेरा हर पैग़ाम।
सब का सब ,
मिट गया ,
मिटा दिया ,
सभी कुछ ,
आंसुओं ने मेरे ,
बह कर ,
धुंधला धुंधला ,
अभी भी ,
नज़र आता है ,
लिखा हुआ ,
शब्द कोई कहीं कहीं ,
मेरी धुंधली ,
यादों की तरह।

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