Sunday, 25 August 2013

परीक्षा प्रेम की ( कविता ) 1 0 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

उसने कहा है ,
मुझे लाना है ,
नदी के उस पार से ,
इक फूल उसकी पसंद का।
मगर नहीं पार करना ,
तेज़ धार वाली गहरी नदी को ,
उस पर बने हुए पुल से ,
न ही लेना है सहारा ,
कश्ती वाले का।
मालूम है उसे भी ,
नहीं आता है तैरना मुझको ,
अंजाम जानते हैं दोनों ,
डूबना ही है आखिर ,
डर नहीं इसका ,
कि नहीं बच सकूंगा मैं ,
दुःख तो इस बात का है ,
कि मर के भी मैं ,
पूरी नहीं कर सकूंगा ,
अपने प्यार की ,
छोटी सी अभिलाषा।
परीक्षा में प्यार की ,
उतीर्ण नहीं हो सकता ,
मगर दूंगा अवश्य ,
अपने प्यार की ,
परीक्षा मैं आज।

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