Tuesday, 20 August 2013

ग़ज़ल 2 0 9 ( हक नहीं खैरात देने लगे )

हक़ नहीं खैरात देने लगे ,
इक नई सौगात देने लगे !
इश्क़ करना आपको आ गया ,
अब वही जज़्बात देने लगे !
रौशनी का नाम देकर हमें ,
फिर अंधेरी रात देने लगे !
और भी ज़ालिम यहां पर हुए ,
आप सबको मात देने लगे !
बादलों को तरसती रेत को ,
धूप की बरसात देने लगे !
तोड़कर कसमें सभी प्यार की ,
एक झूठी बात देने लगे !
जानते सब लोग "तनहा" यहां ,
किलिये ये दात देने लगे !