Tuesday, 6 August 2013

ग़ज़ल 2 0 8 ( बोलने जब लगे पामाल लोग )

बोलने जब लगे पामाल लोग ,
कुछ नहीं कह सके वाचाल लोग !
हम भला किस तरह करते यकीन ,
खा रहे मुफ़्त रोटी दाल लोग !
खा रहे ठोकरें हम बार बार ,
खेलते आप सब फुटबाल लोग !
देख नेता हुए हैरान आज ,
क्यों समझने लगे हर चाल लोग !
ज़ुल्म सह भर रहे चुप चाप आह ,
और करते भी क्या बदहाल लोग !
मछलियों को लुभाने लग गया है ,
बुन रहे इस तरह कुछ जाल लोग !
कुछ हैं बाहर मगर भीतर हैं और ,
रूह "तनहा" नहीं बस खाल लोग !