Monday, 12 August 2013

चाहत प्यार की ( कविता ) 9 8 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

दूर दूर तक फैली है ,
नफरत की रेत यहां  ,
सब भटक रहे हैं ,
इक जलते हुए रेगिस्तान में ,
प्यार के अमृत कलश की ,
है सभी को तलाश ! !
मिलती है हर किसी को ,
हर दिन हर पल नफरत ,
मिलता है इस जहां में ,
केवल तिरिस्कार ही तिरिस्कार ,
भाग जाना चाहता है हर कोई ,
इस दुनिया से किसी दूसरी दुनिया में ! !
मगर नहीं मालूम किसी को भी ,
ऐसे किसी जहान का पता ,
मिल जाये जहां पर सभी को ,
कोई एक तो अपना उसका ,
जिससे कर सके प्यार और स्नेह की ,
पल दो पल को ही सही , कुछ बातें ! !
भर चुका है सभी का मन ,
झूठे दिखावे की रिश्ते नातों की बातों से ,
जी रहे हैं घुट घुट कर लोग ,
अपनी अपनी इस पराई दुनिया में ,
बिना किसी का सच्चा प्यार पाये ! !
दम घुटता है ,
सांसें टूटती हैं ,
धुंधली नज़रों को नहीं आता ,
कुछ भी नज़र कहीं पर भी ,
यूं ही ढोये जा रहे हम सब ,
बोझ अपने अपने जीवन का ,
बस इक प्यार की चाहत में ,
तमाम उम्र ! !

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