Tuesday, 20 August 2013

ग़ज़ल 2 0 9 ( हक नहीं खैरात देने लगे ) - लोक सेतिया "तनहा"

हक़ नहीं खैरात देने लगे - लोक सेतिया "तनहा"

हक़ नहीं खैरात देने लगे ,
इक नई सौगात देने लगे।

इश्क़ करना आपको आ गया ,
अब वही जज़्बात देने लगे।

रौशनी का नाम देकर हमें ,
फिर अंधेरी रात देने लगे।

और भी ज़ालिम यहां पर हुए ,
आप सबको मात देने लगे।

बादलों को तरसती रेत को ,
धूप की बरसात देने लगे।

तोड़कर कसमें सभी प्यार की ,
एक झूठी बात देने लगे।

जानते सब लोग "तनहा" यहां ,
किलिये ये दात देने लगे।