Wednesday, 10 July 2013

तुम्हारी विजय , मेरी पराजय ( कविता ) भाग 95 - डॉ लोक सेतिया

तुम्हारी विजय , मेरी पराजय ( कविता ) भाग 95 - डॉ लोक सेतिया

छल कपट झूठ धोखा ,
सब किया तुमने क्योंकि ,
नहीं जीत सकते थे कभी भी ,
तुम मुझसे ,
इमानदारी से जंग लड़कर।

इस तरह ,
तुमने जंग लड़ने से पहले ही ,
स्वीकार कर ली थी ,
अपनी पराजय।

मैं नहीं कर सका तुम्हारी तरह ,
छल कपट कभी किसी से ,
मुझे मंज़ूर था हारना भी ,
सही मायने में ,
इमानदारी और उसूल से ,
लड़ कर सच्चाई की जंग।

हार कर भी नहीं हारा मैं ,
क्योंकि जनता हूं ,
मुश्किल नहीं होता ,
तुम्हारी तरह जीतना ,
आसान नहीं होता हार कर भी ,
हारना नहीं अपना ईमान।

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