Wednesday, 10 July 2013

तुम्हारी जीत से बेहतर है मेरी पराजय ( कविता ) 9 5 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

छल ,कपट ,झूठ ,धोखा ,
सब किया तुमने ,
क्योंकि ,
नहीं जीत सकते थे कभी भी ,
तुम मुझसे ,
इमानदारी से जंग लड़कर !
इस तरह ,
तुमने जंग लड़ने से पहले ही ,
स्वीकार कर ली थी ,
अपनी पराजय !
मैं नहीं कर सका ,
तुम्हारी तरह ,
छल ,कपट कभी किसी से ,
मुझे मंज़ूर था हारना भी ,
सही मायने में,
इमानदारी और उसूल से ,
लड़ कर सच्चाई की जंग !
हार कर भी नहीं हारा मैं ,
क्योंकि जनता हूं ,
मुश्किल नहीं होता ,
तुम्हारी तरह जीतना ,
आसान नहीं होता ,
हार कर भी ,
हारना नहीं अपना ईमान !

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