Sunday, 7 July 2013

जीना सीखना है मैंने ( कविता ) 9 2 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

मुझे याद है ,
बचपन में ,
जब भी कोई ,
कहता था ,
सब है ईश्वर ,
और भाग्य के हाथ में ,
मेरे मन में ,
उठा करते थे बहुत सवाल ,
जो पूछता था मैं ,
उन सभी से ,
जिनका काम था ,
फैलाना अंधविश्वास !!
लेकिन जैसे जैसे बड़ा हुआ ,
मैं भी बन ही गया ,
उसी भीड़ का ही हिस्सा ,
और अपनी हर मुश्किल ,
हल करने के लिये ,
करने लगा ,
भरोसा भाग्य का ,
और देवी देवताओं का !
खुद पर नहीं रह गया ,
मुझको यकीन ,
करने लगा जाने क्या क्या ,
ईश्वर को प्रसन्न करने को ,
अपना भाग्य बदलने को ,
मुश्किलें ही मुश्किलें ,
मिलीं हैं उम्र भर मुझे ,
ज़िंदगी कभी आसान हो न सकी ,
मेरे ऐसे हर दिन किये ,
ऐसे सभी प्रयासों से ,
दुआ मेरी आज तक ,
नहीं ला सकी कुछ भी असर ,
हुआ नहीं आज तक ,
किसी समस्या का कभी ,
समाधान भाग्य भरोसे ,
न ही ईश्वर को ,
प्रसन्न करने को की बातों से !!
आज सोचता हूं फिर से वही ,
बचपन की पुरानी बात ,
किसलिये वो सभी हैं परेशान ,
जो करते हैं तेरी पूजा अर्चना ,
हरदम रहते हैं डरे डरे ,
तुझसे हे ईश्वर ,
करते हैं विश्वास ,
कि सब अच्छा करते हो तुम ,
जबकि कुछ भी ,
नहीं अच्छा होता आजकल ! !
सीखा नहीं अभी तक ,
जीने का सलीका हमने ,
समझना होगा आखिर इक दिन ,
सब करना होगा अपने आप ,
जूझना होगा मुश्किलों से ,
समस्याओं से , परेशानियों से ,
और लेना होगा ज़िंदगी का मज़ा ,
खुद पर ,
अपने आत्मविश्वास पर ,
कर भरोसा ,
भाग्य और ईश्वर के भरोसे कब तक ,
पाते रहेंगे ,
बिना किये जुर्मों की ,
हम सज़ा !!

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