Saturday, 27 July 2013

अभ्यस्त ( कविता ) 9 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

परेशान थी उसकी नज़रें ,
व्याकुल थी देखने को ,
मेरी टूटती हुई सांसें  !
मैं समझ रहा था ,
बेचैनी उसकी ,
देख रहा था ,
उसकी बढ़ती हुई घबराहट !
वक़्त गुज़रता जा रहा था ,
और उसके साथ साथ ,
बदल रहा था हर पल ,
उसके चेहरे का रंग !
मुझे दिया था भर कर ,
अपने हाथों से उसने ,
जब विष का भरा प्याला ,
और पी लिया था ,
चुपचाप मैंने सारा ज़हर !
उसके साथ साथ मैं भी ,
कर रहा था इंतज़ार मौत का ,
पूछा था सवाल उसने ,
न जाने किस से ,
मुझसे अथवा खुद अपने आप से ,
नहीं क्यों हो रहा है ,
उसके दिये ज़हर का ,
कोई भी असर मुझपर !
समझ गया था मैं लेकिन ,
किस तरह समझाता उसे ,
उम्र भर करता रहा हूं ,
प्रतिदिन विषपान मैं ,
दुनिया वालों की ,
सभी अपनों बेगानों की ,
बातों का जिन में भरा होता था ,
नफरत के ज़हर का ,
अभ्यस्त हो चुका हूं ,
विषपान का कब से ,
तभी कोई भी ज़हर अब मुझ पर ,
नहीं करता है कुछ भी असर ! !

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