Monday, 29 July 2013

आँगन ( कविता ) 9 4 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

ऊंचीं ऊंची दीवारें हैं घेरे हुए मुझे ,
बंद है हर रास्ता मेरे लिये ,
धूप आंधी सर्दी गर्मी बरसात ,
सब कुछ सहना पड़ता है मुझे ,
खिड़कियां दरवाज़े हैं सब के लिये ,
मेरे लिये है खुला आसमान ,
देख सकता हूं उतनी ही दुनिया ,
जितनी नज़र आती है ,
ऊंची ऊंची दीवारों में से दिखाई देते आकाश से !
खुलते हैं दरवाज़े और खिड़कियां ,
हवा के लिये ,
रौशनी के लिये ,
सभी कमरों के मुझ में ही आकर ,
जब भी किसी को पड़ती है कोई ज़रूरत ,
रात के अंधेरे में ,
तपती लू में ,
आंधी में तूफान में ,
बंद हो जाती है हर इक खिड़की ,
नहीं खुलता कोई भी दरवाज़ा ,
सब सहना होता है मुझको अकेले में ,
सहना पड़ता है सभी कुछ चुप चाप ,
मैं आंगन हूं इस घर का ,
मैं हर किसी के लिये हूं हमेशा ,
नहीं मगर कोई भी मेरे लिये कभी भी !

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