Saturday, 27 July 2013

अभ्यस्त ( कविता ) 5 7 ( डॉ लोक सेतिया )

  5 7      अभ्यस्त ( कविता )- डॉ लोक सेतिया

परेशान थी उसकी नज़रें
व्याकुल थी देखने को
मेरी टूटती हुई सांसें।

मैं समझ रहा था
बेचैनी उसकी
देख रहा था
उसकी बढ़ती हुई घबराहट।

वक़्त गुज़रता जा रहा था
और उसके साथ साथ
बदल रहा था हर पल
उसके चेहरे का रंग।

मुझे दिया था भर कर
अपने हाथों से उसने
जब विष का भरा प्याला
और पी लिया था
चुपचाप मैंने सारा ज़हर।

उसके साथ साथ मैं भी
कर रहा था इंतज़ार मौत का
पूछा था सवाल उसने
न जाने किस से
मुझसे अथवा खुद अपने आप से
नहीं क्यों हो रहा है
उसके दिये ज़हर का
कोई भी असर मुझपर।

समझ गया था मैं लेकिन
किस तरह समझाता उसे
उम्र भर करता रहा हूं
प्रतिदिन विषपान मैं
दुनिया वालों की
सभी अपनों बेगानों की
बातों का जिन में भरा होता था 
नफरत के ज़हर का।

अभ्यस्त हो चुका हूं
विषपान का कब से
तभी कोई भी ज़हर अब मुझ पर
नहीं करता है कुछ भी असर। 

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