Friday, 7 June 2013

ग़ज़ल 2 0 6 ( खुदा देखता तेरे गुनाह , डरना )

खुदा देखता  तेरे  गुनाह , डरना ,
सितमगर सितम की इन्तिहा न  करना !
कई लोग फिसले , फिसलते गये हैं ,
वहीं पर खड़े हो , संभलकर उतरना !
किये दफ़्न तुमने , जिस्म तो हमारे ,
बहेगा हमेशा प्यार का ये झरना !
परिंदे यही फरियाद कर रहे हैं ,
किसी के परों को मत कभी कतरना !
नहीं दूर अपनी मौत जानते हैं ,
किया पर नहीं मंजूर रोज़ मरना !
बिना नीवं देखो बन गई इमारत ,
किसी दिन पड़ेगा टूटकर बिखरना !
सुबह शाम "तनहा" देखकर के सूरज ,
हैं कहते, सिखा दो डूबकर उभरना !

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