Friday, 7 June 2013

ग़ज़ल 2 0 6 ( खुदा देखता तेरे गुनाह , डरना ) - लोक सेतिया "तनहा"

खुदा देखता तेरे गुनाह , डरना - लोक सेतिया "तनहा"

खुदा देखता  तेरे  गुनाह , डरना ,
सितमगर सितम की इन्तिहा न  करना।

कई लोग फिसले , फिसलते गये हैं ,
वहीं पर खड़े हो , संभलकर उतरना।

किये दफ़्न तुमने , जिस्म तो हमारे ,
बहेगा हमेशा प्यार का ये झरना।

परिंदे यही फरियाद कर रहे हैं ,
किसी के परों को मत कभी कतरना।

नहीं दूर अपनी मौत जानते हैं ,
किया पर नहीं मंजूर रोज़ मरना।

बिना नीवं देखो बन गई इमारत ,
किसी दिन पड़ेगा टूटकर बिखरना।

सुबह शाम "तनहा" देखकर के सूरज ,
हैं कहते, सिखा दो डूबकर उभरना। 

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