Saturday, 25 May 2013

तन्हा राह का तन्हा मुसाफिर ( नज़्म ) 0 ( डॉ लोक सेतिया )

जुड़ा था सभी कुछ मेरे ही नाम के साथ लेकिन ,
ज़माने में नहीं था कुछ भी कहीं पर भी मेरा ,
बहुत रिश्ते-नाते थे मेरे नाम से वाबस्ता ,
मगर उनमें कोई भी नहीं था मेरा अपना !
रहने को इक घर मिलता रहा उम्र भर मुझे ,
मैं रहता रहा वहां मगर परायों की तरह ,
कहने को जानते थे मुझे शहर के तमाम लोग ,
लेकिन नहीं किसी ने पहचाना कभी मुझे !
जो दोस्त बनाये हुए न कभी मेरे अपने ,
दुश्मन भी मुझसे दुश्मनी निभा नहीं पाये ,
साथ हमसफ़र चल नहीं सके मंज़िल तलक ,
रहबर भी राह मुझको दिखला नहीं पाये !
इख़्तियार मेरा खुद पर भी कहां था ,
अपने खिलाफ़ खुद हमेशा खड़ा रहा ,
अकेला था, नहीं था साया तक भी मेरा साथ ,
बस अपने आप से ही बेगाना बन गया मैं !

No comments: