Monday, 27 May 2013

ग़ज़ल 2 0 3 ( उड़ानें ख़्वाब में भरते , कटे जब से हैं पर उनके )

उड़ानें ख़्वाब में भरते , कटे जबसे हैं पर उनके- लोक सेतिया "तनहा"

उड़ानें ख़्वाब में भरते , कटे जबसे हैं पर उनके ,
अभी तक हौसला बाकी , नहीं झुकते हैं सर उनके।

यही बस गुफ़्तगू करनी , अमीरों से गरीबों ने ,
उन्हें भी रौशनी मिलती , अंधेरों में हैं घर उनके।

उन्हें सूली पे चढ़ने का , तो कोई ग़म नहीं था पर ,
यही अफ़सोस था दिल में , अभी बाकी समर उनके।

कहां पूछा किसी ने आज तक साकी से पीने को ,
रहे सबको पिलाते पर , रहे सूखे अधर उनके।

हुई जब शाम रुक जाते , सुबह होते ही चल देते ,
ज़रा कुछ देर बस ठहरे , नहीं रुकते सफ़र उनके।

दिये कुछ आंकड़े सरकार ने , क्या क्या किया हमने ,
बढ़ी गिनती गरीबों की , मिटा डाले सिफ़र उनके।

हमारे ज़ख्म सारे वक़्त ने ऐसे भरे 'तनहा '
चलाये तीर जितने सब हुए अब बेअसर उनके।

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