Saturday, 25 May 2013

तन्हा राह का तन्हा मुसाफिर ( नज़्म ) 0 ( डॉ लोक सेतिया )

 तन्हा राह का तन्हा मुसाफिर ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

जुड़ा था सभी कुछ ,
मेरे ही नाम के साथ लेकिन ,
ज़माने में नहीं था
कुछ भी कहीं पर भी मेरा ,
बहुत रिश्ते-नाते थे ,
मेरे नाम से वाबस्ता ,
मगर उनमें कोई भी ,
नहीं था मेरा अपना।

रहने को इक घर ,
मिलता रहा उम्र भर मुझे ,
मैं रहता रहा वहां ,
मगर परायों की तरह ,
कहने को जानते थे ,
मुझे शहर के तमाम लोग ,
लेकिन नहीं किसी ने ,
पहचाना कभी मुझे।

जो दोस्त बनाये ,
हुए न कभी मेरे अपने ,
दुश्मन भी मुझसे ,
दुश्मनी निभा नहीं पाये ,
साथ हमसफ़र चल नहीं सके,
 मंज़िल तलक ,
रहबर भी राह मुझको ,
दिखला नहीं सके।

इख़्तियार मेरा खुद पर भी कहां था ,
अपने खिलाफ़ खुद हमेशा खड़ा रहा ,
अकेला था नहीं था ,
साया तक भी मेरा साथ ,
बस अपने आप से ही ,
बेगाना बन गया मैं। 

No comments: