Saturday, 13 April 2013

नासमझ कौन है ( कविता ) 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

और कितना ,
और क्या क्या ,
और कौन कौन ,
और कब तक ,
मुझे समझाते रहेंगे ,
और कितने लोग !
क्यों आखिर क्यों ,
आप समझते हैं ,
समझता नहीं मैं कुछ भी ,
और सब कुछ समझते हैं ,
सिर्फ आप , हमेशा आप !
चलो माना ,
हां मान लिया मैंने ,
समझदार होंगे सभी लोग ,
लेकिन क्या ,
आपको है अधिकार ,
किसी को नासमझ कहने का ,
खुद को समझदार कहने वालो ,
शायद पहले समझ लो इक बात ,
किसी और को नासमझ समझना ,
समझदारी नहीं हो सकता !

No comments: