Friday, 26 April 2013

ग़ज़ल 2 0 0 ( बड़ा ही मुख़्तसर उसका फ़साना है )

बड़ा ही मुख्तसर उसका फसाना है ,
बना सच का सदा दुश्मन ज़माना है !
इधर सब दर्द हैं ,उस पार सब खुशियां ,
चला जाये जिसे उस पार जाना है !
कंटीली राह पर चलना यहां पड़ता ,
यही सबको मुहब्बत ने बताना है !
गुज़ारी ज़िंदगी ,आया कहां जीना ,
नया क्या है ,वही किस्सा पुराना है !
जिसे जब जब परख देखा ,वही दुश्मन ,
नहीं अब दोस्तों को आज़माना है !
हमें सारी उम्र इक काम करना है ,
अंधेरों को उजालों से मिलाना है !
ये सारा शहर बदला लग रहा तनहा ,
अभी वैसा तुम्हारा आशियाना है !

No comments: