Saturday, 20 April 2013

ग़ज़ल 1 9 7 ( सभी को हुस्न से होती मुहब्बत है )

सभी को , हुस्न से होती मुहब्बत है ,
हसीं कितनी हसीनों की शिकायत है !
भला दुनिया उन्हें कब याद रखती है ,
कहानी बन चुकी जिनकी हक़ीकत है !
है गुज़री इस तरह कुछ ज़िंदगी अपनी ,
हमें जीना भी लगता इक मुसीबत है !
उन्हें आया नहीं बस दोस्ती करना ,
किसी से भी नहीं बेशक अदावत है !
वो आकर खुद तुम्हारा हाल पूछें जब ,
सुनाना तुम तुम्हारी क्या हिकायत है !
हमें लगती है बेमतलब हमेशा से ,
नहीं सीखी कभी हमने सियासत है !
वहीं दावत ,जहां मातम यहां तनहा ,
हमारे शहर की अपनी रिवायत है !

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