Friday, 19 April 2013

ग़ज़ल 1 9 6 ( आबरू तार तार ख़बरों में )

आबरू तार तार ख़बरों में ,
आदमी शर्मसार ख़बरों में !
शहर बिकने चला खरीदोगे ,
लो पढ़ो इश्तिहार ख़बरों में !
नींद क्या चैन तक गवा बैठे ,
लोग सब बेकरार ख़बरों में !
देख सरकार सो गई शायद ,
मच रही लूट मार ख़बरों में !
आमने सामने नहीं लड़ते ,
कर रहे आर पार ख़बरों में !
झूठ को सच बना दिया ऐसे ,
दोहरा बार बार ख़बरों में !
नासमझ कौन रह गया तनहा ,
सब लगें होशियार ख़बरों में !

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